गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अष्टावक्रगीता * ५११
कर्तव्यदुःखमार्तण्डज्वालादग्धान्तरात्मनः ।
कुतः प्रशमपीयूषधारासारमृते सुखम् ॥ ३ ॥
जिसका चित्त यह कर्तव्य है, यह अकर्तव्य है इत्यादि दुःखोंकी तीव्र ज्वालासे झुलस रहा है, उसे भला कर्म-त्यागरूप शान्तिकी पीयूष-धाराका सेवन किये बिना सुखकी प्राप्ति कैसे हो सकती है ? ॥ ३ ॥
भवोऽयं भावनामात्रो न किञ्चित्परमार्थतः ।
नास्त्यभावः स्वभावानां भावाभावविभाविनाम् ॥ ४ ॥
यह संसार केवल भावना है, परमार्थतः कुछ नहीं है। भाव और अभावके रूपमें स्वभावतः स्थित पदार्थोंका कभी अभाव नहीं हो सकता ॥ ४ ॥
न दूरं न च सङ्कोचाल्लब्धमेवात्मनः पदम् ।
निर्विकल्पं निरायासं निर्विकारं निरञ्जनम् ॥ ५ ॥
आत्माका स्वरूप न दूर है न निकट। वह तो प्राप्त ही है, तुम स्वयं ही हो। उसमें न विकल्प है, न प्रयत्न है, न विकार है और न मल ॥ ५ ॥
व्यामोहमात्रविरतौ स्वरूपादानमात्रतः ।
वीतशोका विराजन्ते निरावरणदृष्टयः ॥ ६ ॥
अज्ञानमात्रकी निवृत्ति होते ही तथा स्वरूपका बोध होते ही दृष्टिका आवरणभंग हो जाता है और तत्त्वज्ञ-पुरुष शोकरहित होकर शोभायमान होते हैं ॥ ६ ॥
समस्तं कल्पनामात्रमात्मा मुक्तः सनातनः ।
इति विज्ञाय धीरो हि किमभ्यस्यति बालवत् ॥ ७ ॥
सब कुछ कल्पनामात्र है और आत्मा नित्य मुक्त है, धीरपुरुष इस बातको जानकर फिर बालकके समान क्या अभ्यास करे ? अर्थात् ज्ञानीके लिये अभ्यास निरर्थक है ॥ ७ ॥