गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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आत्मा ब्रह्मेति निश्चित्य भावाभावौ च कल्पितौ।
निष्कामः किं विजानाति किं ब्रूते च करोति किम्॥ ८॥
आत्मा ही ब्रह्म है और भाव-अभाव कल्पित हैं—ऐसा निश्चय होते ही निष्काम ज्ञानी फिर क्या जाने, क्या कहे, क्या करे?॥ ८॥
अयं सोऽहमयं नाहमिति क्षीणा विकल्पनाः।
सर्वमात्मेति निश्चित्य तृष्णींभूतस्य योगिनः॥ ९॥
सब आत्मा ही है—ऐसा निश्चय करके जो चुप हो गया है, उस पुरुषके लिये यह मैं हूँ, यह मैं नहीं हूँ इत्यादि विकल्पनाएँ शान्त हो जाती हैं॥ ९॥
न विक्षेपो न चैकाग्र्यं नातिबोधो न मूढता।
न सुखं न च वा दुःखमुपशान्तस्य योगिनः॥ १०॥
अपने स्वरूपमें स्थित होकर शान्त हुए तत्त्वज्ञके लिये न विक्षेप है और न तो एकाग्रता, न ज्ञान है, न अज्ञान, न सुख है न दुःख॥ १०॥
स्वाराज्ये भैक्ष्यवृत्तौ च लाभालाभे जने वने।
निर्विकल्पस्वभावस्य न विशेषोऽस्ति योगिनः॥ ११॥
जो तत्त्वज्ञ योगी स्वभावसे ही निर्विकल्प है, उसके लिये अपने राज्यमें अथवा भिक्षामें, लाभ-हानिमें, भीड़में अथवा सूने जंगलमें कोई अन्तर नहीं है॥ ११॥
क्व धर्मः क्व च वा कामः क्व चार्थः क्व विवेकिता।
इदं कृतमिदं नेति द्वन्द्वैर्मुक्तस्य योगिनः॥ १२॥
यह कर लिया और वह कार्य शेष है—इन द्वन्द्वोंसे जो (तत्त्वज्ञ) मुक्त है, उसके लिये धर्म कहाँ, काम कहाँ, अर्थ कहाँ और विवेक भी कहाँ है?॥ १२॥
कृत्यं किमपि नैवास्ति न कापि हृदि रञ्जना।
यथा जीवनमेवेह जीवन्मुक्तस्य योगिनः॥ १३॥
जीवन्मुक्त ज्ञानीके लिये न तो कुछ कर्तव्य है और न तो उसके