गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अष्टावक्रगीता * ५१५
न तो कभी कुछ पानेकी आशा॥ २३॥
प्रकृत्या शून्यचित्तस्य कुर्वतोऽस्य यदृच्छया।
प्राकृतस्येव धीरस्य न मानो नावमानिता ॥ २४॥
जिस धीरका चित्त स्वभावसे ही शून्य (निर्विषय) है, वह साधारण पुरुषके समान प्रारब्धवश बहुतसे काम करता रहता है, परंतु न उसे मान होता है और न तो अपमान ही॥ २४॥
कृतं देहेन कर्मेदं न मया शुद्धरूपिणा।
इति चिन्तानुरोधी यः कुर्वन्नपि करोति न॥ २५॥
‘यह कर्म शरीरने किया है मैंने नहीं, मैं तो शुद्ध स्वरूप हूँ’— इस प्रकार जिसने निश्चय कर लिया है, वह कर्म करता हुआ भी नहीं करता॥ २५॥
अतद्वादीव कुरुते न भवेदपि बालिशः।
जीवन्मुक्तः सुखी श्रीमान् संसरन्नपि शोभते ॥ २६॥
सुखी एवं श्रीमान् जीवन्मुक्त पुरुष असत्यवादी विषयीके समान काम करता है; परंतु विषयी नहीं होता। यह तो संसारका कार्य करता हुआ भी अतिशय शोभाको प्राप्त होता है॥ २६॥
नानाविचारसुश्रान्तो धीरो विश्रान्तिमागतः।
न कल्पते न जानाति न शृणोति न पश्यति ॥ २७ ॥
जो धीर पुरुष अनेक विचारोंसे थककर अपने स्वरूपमें विश्राम पा चुका है, वह न कल्पना करता है, न जानता है, न सुनता है और न देखता है॥ २७॥
असमाधेरविक्षेपान्न मुमुक्षुर्न चेतरः।
निश्चित्य कल्पितं पश्यन् ब्रह्मैवास्ते महाशयः ॥ २८ ॥
ज्ञानी महापुरुष समाहित चित्तमें आग्रह न होनेके कारण मुमुक्षु