गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
पृष्ठ 515, कुल 675 में से
संदर्भ में पढ़ें५१४ * गीता-संग्रह *
लोगों-जैसा व्यवहार करता हुआ भी अपने स्वरूपमें न समाधि देखता
है, न विक्षेप और न तो लेप ही ॥ १८ ॥
भावाभावविहीनो यस्तृप्तो निर्वासनो बुधः।
नैव किञ्चित् कृतं तेन लोकदृष्ट्या विकुर्वता ॥ १९ ॥
तत्त्वज्ञ-पुरुष भाव और अभावसे रहित, तृप्त एवं वासनारहित
होता है। लोक-दृष्टिसे सीधा-उल्टा बहुत कुछ करते रहनेपर भी
वस्तुतः वह कुछ नहीं करता ॥ १९ ॥
प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा नैव धीरस्य दुर्ग्रहः।
यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वा तिष्ठतः सुखम् ॥ २० ॥
तत्त्वज्ञ-पुरुषका प्रवृत्ति अथवा निवृत्तिसे दुराग्रह नहीं होता है।
जब जो सामने आ जाता है, तब उसे करके वह मौजसे रहता है ॥ २० ॥
निर्वासनो निरालम्बः स्वच्छन्दो मुक्तबन्धनः।
क्षिप्तः संस्कारवातेन चेष्टते शुष्कपर्णवत् ॥ २१ ॥
ज्ञानी पुरुष वासना, आलम्बन, परतन्त्रता आदिके बन्धनोंसे सर्वथा
मुक्त होता है। प्रारब्धरूपी वायुके वेगसे उसका शरीर उसी प्रकार
गतिशील रहता है, जैसे वायुवेगसे सूखा पत्ता ॥ २१ ॥
असंसारस्य तु क्वापि न हर्षो न विषादिता।
स शीतलमना नित्यं विदेह इव राजते ॥ २२ ॥
संसारमुक्त पुरुषको न कभी कहीं हर्ष होता है और न विषाद।
उसका मन सर्वदा शीतल रहता है और वह (सदेह होनेपर भी)
विदेहके समान शोभायमान होता है ॥ २२ ॥
कुत्रापि न जिहासास्ति आशा वापि न कुत्रचित्।
आत्मारामस्य धीरस्य शीतलाच्छतरात्मनः ॥ २३ ॥
जिसका अन्तःकरण शीतल एवं स्वच्छ है, जो आत्माराम है,
उस धीर पुरुषकी न तो किसी वस्तुके त्यागकी इच्छा होती है और