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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

DevanagariHindipublished675 पृष्ठ

५१४ * गीता-संग्रह *


लोगों-जैसा व्यवहार करता हुआ भी अपने स्वरूपमें न समाधि देखता
है, न विक्षेप और न तो लेप ही ॥ १८ ॥
भावाभावविहीनो यस्तृप्तो निर्वासनो बुधः।
नैव किञ्चित् कृतं तेन लोकदृष्ट्या विकुर्वता ॥ १९ ॥
तत्त्वज्ञ-पुरुष भाव और अभावसे रहित, तृप्त एवं वासनारहित
होता है। लोक-दृष्टिसे सीधा-उल्टा बहुत कुछ करते रहनेपर भी
वस्तुतः वह कुछ नहीं करता ॥ १९ ॥
प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा नैव धीरस्य दुर्ग्रहः।
यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वा तिष्ठतः सुखम् ॥ २० ॥
तत्त्वज्ञ-पुरुषका प्रवृत्ति अथवा निवृत्तिसे दुराग्रह नहीं होता है।
जब जो सामने आ जाता है, तब उसे करके वह मौजसे रहता है ॥ २० ॥
निर्वासनो निरालम्बः स्वच्छन्दो मुक्तबन्धनः।
क्षिप्तः संस्कारवातेन चेष्टते शुष्कपर्णवत् ॥ २१ ॥
ज्ञानी पुरुष वासना, आलम्बन, परतन्त्रता आदिके बन्धनोंसे सर्वथा
मुक्त होता है। प्रारब्धरूपी वायुके वेगसे उसका शरीर उसी प्रकार
गतिशील रहता है, जैसे वायुवेगसे सूखा पत्ता ॥ २१ ॥
असंसारस्य तु क्वापि न हर्षो न विषादिता।
स शीतलमना नित्यं विदेह इव राजते ॥ २२ ॥
संसारमुक्त पुरुषको न कभी कहीं हर्ष होता है और न विषाद।
उसका मन सर्वदा शीतल रहता है और वह (सदेह होनेपर भी)
विदेहके समान शोभायमान होता है ॥ २२ ॥
कुत्रापि न जिहासास्ति आशा वापि न कुत्रचित्।
आत्मारामस्य धीरस्य शीतलाच्छतरात्मनः ॥ २३ ॥
जिसका अन्तःकरण शीतल एवं स्वच्छ है, जो आत्माराम है,
उस धीर पुरुषकी न तो किसी वस्तुके त्यागकी इच्छा होती है और

  • अष्टावक्रगीता * ५१५

न तो कभी कुछ पानेकी आशा॥ २३॥

प्रकृत्या शून्यचित्तस्य कुर्वतोऽस्य यदृच्छया।
प्राकृतस्येव धीरस्य न मानो नावमानिता ॥ २४॥

जिस धीरका चित्त स्वभावसे ही शून्य (निर्विषय) है, वह साधारण पुरुषके समान प्रारब्धवश बहुतसे काम करता रहता है, परंतु न उसे मान होता है और न तो अपमान ही॥ २४॥

कृतं देहेन कर्मेदं न मया शुद्धरूपिणा।
इति चिन्तानुरोधी यः कुर्वन्नपि करोति न॥ २५॥

‘यह कर्म शरीरने किया है मैंने नहीं, मैं तो शुद्ध स्वरूप हूँ’— इस प्रकार जिसने निश्चय कर लिया है, वह कर्म करता हुआ भी नहीं करता॥ २५॥

अतद्वादीव कुरुते न भवेदपि बालिशः।
जीवन्मुक्तः सुखी श्रीमान् संसरन्नपि शोभते ॥ २६॥

सुखी एवं श्रीमान् जीवन्मुक्त पुरुष असत्यवादी विषयीके समान काम करता है; परंतु विषयी नहीं होता। यह तो संसारका कार्य करता हुआ भी अतिशय शोभाको प्राप्त होता है॥ २६॥

नानाविचारसुश्रान्तो धीरो विश्रान्तिमागतः।
न कल्पते न जानाति न शृणोति न पश्यति ॥ २७ ॥

जो धीर पुरुष अनेक विचारोंसे थककर अपने स्वरूपमें विश्राम पा चुका है, वह न कल्पना करता है, न जानता है, न सुनता है और न देखता है॥ २७॥

असमाधेरविक्षेपान्न मुमुक्षुर्न चेतरः।
निश्चित्य कल्पितं पश्यन् ब्रह्मैवास्ते महाशयः ॥ २८ ॥

ज्ञानी महापुरुष समाहित चित्तमें आग्रह न होनेके कारण मुमुक्षु

५१६ * गीता-संग्रह *

नहीं और विक्षेप नहीं होनेके कारण विषयी नहीं है। मेरे सिवाय जो कुछ दीख रहा है सब कल्पित ही है—ऐसा निश्चय करके सबको देखता हुआ वह वास्तवमें ब्रह्म ही है॥ २८॥
यस्यान्तः स्यादहङ्कारो न करोति करोति सः।
निरहङ्कारधीरेण न किञ्चिद्वि कृतं कृतम्॥ २९॥
जिसके भीतर अहंकार है वह देखनेमें कर्म न करे तो भी करता है, पर जो धीर-पुरुष निरहंकार है; वह सब कुछ करते हुए भी कर्मरहित है॥ २९॥
नोद्विग्नं न च सन्तुष्टं कर्तृत्वमदवर्जितम्।
निराशं गतसन्देहं चित्तं मुक्तस्य राजते॥ ३०॥
मुक्त पुरुषके चित्तमें न उद्वेग है, न सन्तोष और न कर्तृत्वका अभिमान ही रहता है। उसके चित्तमें न आशा है, न सन्देह। वास्तवमें ऐसे चित्तकी ही शोभा है॥ ३०॥
निर्ध्यातुं चेष्टितुं वापि यच्चित्तं न प्रवर्तते।
निर्निमित्तमिदं किन्तु निर्ध्यायति विचेष्टते॥ ३१॥
जीवन्मुक्तका चित्त ध्यानसे विरत होनेके लिये और व्यवहार करनेके लिये प्रवृत्त नहीं होता है, किंतु निमित्त-शून्य होनेपर भी वह ध्यानसे विरत भी होता है और व्यवहार भी करता है॥ ३१॥
तत्त्वं यथार्थमाकर्ण्य मन्दः प्राप्नोति मूढताम्।
अथवायाति सङ्कोचममूढः कोऽपि मूढवत्॥ ३२॥
बुद्धिशून्य पुरुष यथार्थ-तत्त्वका वर्णन सुनकर और अधिक मूढ़ता (संशय-विपर्यय) को प्राप्त होता है अथवा संकुचित हो जाता है। कभी-कभी तो कोई-कोई बुद्धिमान् पुरुष भी उसी मूढ़के समान व्यवहार करने लगते हैं॥ ३२॥

  • अष्टावक्रगीता * ५१७

एकाग्रता निरोधो वा मूढैरभ्यस्यते भृशम्।
धीराः कृत्यं न पश्यन्ति सुप्तवत्स्वपदे स्थिताः ॥ ३३ ॥

मूढ़ पुरुष बार-बार एकाग्रता तथा निरोधका अभ्यास करते रहते हैं। धीर पुरुष सुषुप्तके समान अपने स्वरूपमें स्थित रहते हुए कुछ भी कर्तव्यरूपसे नहीं देखते ॥ ३३ ॥

अप्रयत्नात्प्रयत्नाद्वा मूढो नाप्नोति निर्वृतिम्।
तत्त्वनिश्चयमात्रेण प्राज्ञो भवति निर्वृतः ॥ ३४ ॥

मूढ़ पुरुष प्रयत्नसे अथवा प्रयत्न-त्यागसे शान्ति नहीं प्राप्त करता। प्रज्ञावान् पुरुष तत्त्वके निश्चयमात्रसे शान्ति प्राप्त कर लेता है ॥ ३४ ॥

शुद्धं बुद्धं प्रियं पूर्णं निष्प्रपञ्चं निरामयम्।
आत्मानं तं न जानन्ति तत्राभ्यासपरा जनाः ॥ ३५ ॥

आत्माके सम्बन्धमें जो लोग अभ्यासमें लग रहे हैं, वे अपने शुद्ध, बुद्ध, प्रिय, पूर्ण, निष्प्रपंच और निरामय ब्रह्म-स्वरूपको बिलकुल ही नहीं जानते हैं ॥ ३५ ॥

नाप्नोति कर्मणा मोक्षं विमूढोऽभ्यासरूपिणा।
धन्यो विज्ञानमात्रेण मुक्तस्तिष्ठत्यविक्रियः ॥ ३६ ॥

अज्ञानी मनुष्य कर्मरूप अभ्यासके द्वारा मुक्ति नहीं पा सकता और ज्ञानी कर्मरहित होनेपर भी केवल ज्ञानसे मुक्ति प्राप्त कर लेता है ॥ ३६ ॥

मूढो नाप्नोति तद् ब्रह्म यतो भवितुमिच्छति।
अनिच्छन्नपि धीरो हि परब्रह्म स्वरूपभाक् ॥ ३७ ॥

अज्ञानीको ब्रह्मसाक्षात्कार नहीं हो सकता; क्योंकि वह ब्रह्म होना चाहता है (इच्छामात्र ही ब्रह्मत्वमें प्रतिबन्धक है)। ज्ञानी पुरुष इच्छा न करनेपर भी परब्रह्म-बोध-स्वरूप रहता है ॥ ३७ ॥

५१८ * गीता-संग्रह *


निराधाराग्रहव्यग्रा मूढाः संसारपोषकाः।
एतस्यानर्थमूलस्य मूलच्छेदः कृतो बुधैः॥ ३८॥
अज्ञानी निराधार आग्रहोंमें पड़कर संसारका पोषण करते रहते हैं। ज्ञानियोंने समस्त अनर्थोंकी जड़ संसार-सत्ताका ही सर्वथा उच्छेद कर दिया है॥ ३८॥

न शान्तिं लभते मूढो यतः शमितुमिच्छति।
धीरस्तत्त्वं विनिश्चित्य सर्वदा शान्तमानसः॥ ३९॥
अज्ञानीको शान्ति नहीं मिल सकती; क्योंकि वह शान्त होनेकी इच्छासे युक्त है (इच्छा ही अशान्ति है)। ज्ञानी पुरुष तत्त्वका दृढ़ निश्चय करके सर्वदा शान्तचित्त ही रहता है॥ ३९॥

क्वात्मनो दर्शनं तस्य यद्दृष्टमवलम्बते।
धीरास्ते तं न पश्यन्ति पश्यन्त्यात्मानमव्ययम्॥ ४०॥
अज्ञानीको आत्मसाक्षात्कार कैसे हो सकता है, जबकि वह दृश्य पदार्थोंका आलम्बन स्वीकार करता है। ज्ञानी पुरुष वे हैं, जो उन दृश्य पदार्थोंको देखते ही नहीं और अपने अविनाशी स्वरूपको ही देखते हैं॥ ४०॥

क्व निरोधो विमूढस्य यो निर्बन्धं करोति वै।
स्वारामस्यैव धीरस्य सर्वदासावकृत्रिमः॥ ४१॥
जो आग्रह करता है, उस मूर्खका चित्त निरुद्ध कहाँ है? स्थित-प्रज्ञ आत्मारामका चित्त तो सर्वदा स्वाभाविक ही निरुद्ध रहता है॥ ४१॥

भावस्य भावकः कश्चिन्न किञ्चिद्भावकोऽपरः।
उभयाभावकः कश्चिदेवमेव निराकुलः॥ ४२॥
कोई पदार्थ-सत्ताकी भावना करता है और कोई पदार्थोंकी असत्ताकी भावना करता है। ज्ञानीपुरुष तो भाव-अभाव दोनोंकी भावना छोड़कर यों ही निश्चिन्त (मस्त) रहता है॥ ४२॥

  • अष्टावक्रगीता * ५१९

शुद्धमद्वयमात्मानं भावयन्ति कुबुद्धयः।
न तु जानन्ति सम्मोहाद्यावज्जीवमनिर्वृताः॥ ४३॥
बुद्धिहीन पुरुष अज्ञानवश अपने शुद्ध अद्वितीय स्वरूपका ज्ञान तो प्राप्त करते नहीं, भावना करते हैं। उन्हें जीवनपर्यन्त शान्ति नहीं मिलती॥ ४३॥

मुमुक्षोर्बुद्धिरालम्बमन्तरेण न विद्यते।
निरालम्बैव निष्कामा बुद्धिर्मुक्तस्य सर्वदा॥ ४४॥
मुमुक्षु पुरुषकी बुद्धि कुछ-न-कुछ आलम्बन ग्रहण किये बिना नहीं रहती। मुक्त पुरुषकी बुद्धि तो सर्वथा निष्काम और निरालम्ब ही रहती है॥ ४४॥

विषयद्वीपिनो वीक्ष्य चकिताः शरणार्थिनः।
विशन्ति झटिति क्रोडन्निरोधैकाग्र्यसिद्धये॥ ४५॥
अज्ञानी पुरुष विषयरूपी मतवाले हाथियोंको देखकर भयभीत हो जाते हैं और शरणके लिये तुरत निरोध और एकाग्रताकी सिद्धिहेतु झट-पट चित्तकी गुफामें घुस जाते हैं॥ ४५॥

निर्वासनं हरिं दृष्ट्वा तूष्णीं विषयदन्तिनः।
पलायन्ते न शक्तास्ते सेवन्ते कृतचाटवः॥ ४६॥
वासनाहीन ज्ञानी सिंह है, उसे देखकर विषयके मतवाले हाथी चुपचाप भाग जाते हैं। उनकी एक नहीं चलती। उलटे वे तरह-तरहसे खुशामद करके सेवा करते हैं॥ ४६॥

न मुक्तिकारिकान् धत्ते निःशङ्को युक्तमानसः।
पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्नास्ते यथासुखम्॥ ४७॥
निःशंक तत्त्वज्ञ पुरुष मुक्तिके साधनोंका अभ्यास नहीं करता है, वह तो देखते, सुनते, छूते, सूँघते, भोगते हुए भी आनन्दमें मग्न रहता है॥ ४७॥

५२० * गीता-संग्रह *


वस्तुश्रवणमात्रेण शुद्धबुद्धिर्निराकुलः।
नैवाचारमनाचारमौदास्यं वा प्रपश्यति ॥ ४८ ॥
शुद्धबुद्धि पुरुष वस्तुतत्त्वका श्रवण करनेमात्रसे आकुलतारहित हो जाता है, फिर आचार-अनाचार अथवा उदासीनतापर उसकी दृष्टि नहीं जाती है॥ ४८ ॥

यदा यत्कर्तुमायाति तदा तत्कुरुते ऋजुः।
शुभं वाप्यशुभं वापि तस्य चेष्टा हि बालवत् ॥ ४९ ॥
स्वभावस्थ ज्ञानी शुभ हो चाहे अशुभ, जो जब करनेके लिये सामने आ जाता है तब वह उसे सरलतासे कर डालता है। उसकी चेष्टा बच्चेके समान होती है॥ ४९ ॥

स्वातन्त्र्यात्सुखमाप्नोति स्वातन्त्र्याल्लभते परम्।
स्वातन्त्र्यान्निर्वृतिं गच्छेत् स्वातन्त्र्यात्परमं पदम् ॥ ५० ॥
स्वतन्त्रतासे ही सुखकी प्राप्ति होती है। स्वतन्त्रतासे ही परतत्त्वकी उपलब्धि होती है। स्वतन्त्रतासे ही परम शान्तिकी प्राप्ति होती है। स्वतन्त्रतासे ही परम पद मिलता है॥ ५० ॥

अकर्तृत्वमभोक्तृत्वं स्वात्मनो मन्यते यदा।
तदा क्षीणा भवन्त्येव समस्ताश्चित्तवृत्तयः ॥ ५१ ॥
जब जिज्ञासु पुरुष अपने-आपको अकर्ता और अभोक्ता निश्चय कर लेता है, तब चित्तकी समस्त वृत्तियाँ क्षीण हो ही जाती हैं॥ ५१ ॥

उच्छृङ्खलाप्याकृतिका स्थितिर्धीरस्य राजते।
न तु सस्पृहचित्तस्य शान्तिर्मूढस्य कृत्रिमा ॥ ५२ ॥
स्थितप्रज्ञ पुरुषकी स्वाभाविक स्थिति उच्छृंखल होनेपर भी श्रेष्ठ है। अज्ञानी पुरुषकी, जिसके चित्तमें अनेक इच्छाएँ भरी हैं बनावटी शान्ति सुशोभित नहीं होती॥ ५२ ॥

  • अष्टावक्रगीता * ५२१

विलसन्ति महाभोगैर्विशन्ति गिरि‌गह्वरान्।
निरस्तकल्पना धीरा अबद्धा मुक्तबुद्धयः ॥ ५३ ॥

स्थितप्रज्ञ पुरुष महान् भोगोंमें विलास करते हैं और पर्वतोंकी गहन गुफाओंमें भी प्रवेश करते हैं, किंतु वे कल्पना, बन्धन एवं बुद्धि-वृत्तियोंसे मुक्त होते हैं॥ ५३॥

श्रोत्रियं देवतां तीर्थमङ्गनां भूपतिं प्रियम्।
दृष्ट्वा सम्पूज्य धीरस्य न कापि हृदि वासना ॥ ५४ ॥

स्थितप्रज्ञ पुरुष श्रोत्रिय, देवता, तीर्थ, स्त्री, राजा और प्रियको देखकर उनका सत्कार करता है, परंतु उसके हृदयमें कोई वासना नहीं होती है॥ ५४॥

भृत्यैः पुत्रैः कलत्रैश्च दौहित्रैश्चापि गोत्रजैः।
विहस्य धिक्कृतो योगी न याति विकृतिं मनाक् ॥ ५५ ॥

सेवक, पुत्र, स्त्री, दौहित्र और सगोत्रके द्वारा हँसी उड़ाये जानेपर, धिक्कार देनेपर भी तत्त्वज्ञ-पुरुषके चित्तमें तनिक भी विकार नहीं होता॥ ५५॥

सन्तुष्टोऽपि न सन्तुष्टः खिन्नोऽपि न च खिद्यते।
तस्याश्चर्यदशां तां तां तादृशा एव जानते ॥ ५६ ॥

लोगोंकी दृष्टिसे प्रसन्न दीखनेपर भी वह प्रसन्न नहीं होता और खिन्न दीखनेपर भी खिन्न नहीं होता। उसकी उन आश्चर्यकारी दशाओंको वैसे लोग ही जानते हैं॥ ५६॥

कर्तव्यतैव संसारो न तां पश्यन्ति सूरयः।
शून्याकारा निराकारा निर्विकारा निरामयाः ॥ ५७ ॥

कर्तव्यबुद्धिका नाम ही संसार है। विद्वान् लोग उस कर्तव्यताको ही नहीं देखते; क्योंकि वे शून्याकार, निराकार, निर्विकार एवं निरामय होते हैं॥ ५७॥

५२२ * गीता-संग्रह *


अकुर्वन्नपि संक्षोभाद्व्यग्रः सर्वत्र मूढधीः।
कुर्वन्नपि तु कृत्यानि कुशलो हि निराकुलः॥ ५८ ॥

अज्ञानी पुरुष कुछ न करता हो तब भी क्षोभवश सर्वत्र व्यग्र ही रहता है। स्थितप्रज्ञ (कुशल) पुरुष बहुत-से काम करता हुआ भी शान्त रहता है॥५८॥

सुखमास्ते सुखे शेते सुखमायाति याति च।
सुखं वक्ति सुखं भुङ्क्ते व्यवहारेऽपि शान्तधीः॥ ५९ ॥

स्थितप्रज्ञ पुरुष व्यवहारमें भी सुखसे बैठता है, सुखसे सोता है, सुखसे आता-जाता है, सुखसे बोलता है और सुखसे खाता भी है॥ ५९ ॥

स्वभावाद्यस्य नैवार्त्तिर्लोकवद्व्यवहारिणः।
महाह्रद इवाक्षोभ्यो गतक्लेशः स शोभते॥ ६० ॥

जो महाह्रदके समान अक्षुब्ध है और स्वभावसे ही जिसको व्यवहार करते रहनेपर भी साधारण लोगोंके समान पीड़ा नहीं होती, वह दुःखरहित ज्ञानी शोभायमान होता है॥ ६०॥

निवृत्तिरपि मूढस्य प्रवृत्तिरुपजायते।
प्रवृत्तिरपि धीरस्य निवृत्तिफलदायिनी॥ ६१ ॥

मूढ़की निवृत्ति भी प्रवृत्ति-जैसी हो जाती है। स्थितप्रज्ञकी प्रवृत्ति भी निवृत्तिका फल देती है॥ ६१ ॥

परिग्रहेषु वैराग्यं प्रायो मूढस्य दृश्यते।
देहे विगलिताशस्य क्व रागः क्व विरागिता॥ ६२ ॥

अज्ञानी पुरुष प्रायः गृह-द्रव्यादि पदार्थोंसे वैराग्य करता दीखता है, परंतु जिसका देहाभिमान नष्ट हो चुका है, उसके लिये कहाँ राग कहाँ विराग?॥ ६२ ॥

* अष्टावक्रगीता * ५२३

भावनाभावनासक्ता दृष्टिर्मूढस्य सर्वदा।
भाव्यभावनया सा तु स्वस्थस्यादृष्टिरूपिणी ॥ ६३ ॥

अज्ञानीकी दृष्टि सर्वदा भाव या अभावमें लगी रहती है, तत्त्वज्ञ-पुरुषकी दृष्टि तो दृश्यको देखते रहनेपर भी अदृष्टि ही है॥ ६३ ॥

सर्वारम्भेषु निष्कामो यश्चरेद् बालवन्मुनिः।
न लेपस्तस्य शुद्धस्य क्रियमाणेऽपि कर्मणि ॥ ६४ ॥

जो तत्त्वज्ञ सभी कामोंमें बालकके समान निष्काम व्यवहार करता है, वह शुद्ध है। कर्म करनेपर भी वह लिप्त नहीं होता ॥ ६४ ॥

स एव धन्य आत्मज्ञः सर्वभावेषु यः समः।
पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्निस्तर्षमानसः ॥ ६५ ॥

वह आत्मज्ञानी धन्य है, जो समस्त स्थितियोंमें सम रहता है। देखते, सुनते, छूते, सूँघते और खाते-पीते भी उसका मानस तृष्णा-रहित होता है ॥ ६५ ॥

क्व संसारः क्व चाभासः क्व साध्यं क्व च साधनम्।
आकाशस्येव धीरस्य निर्विकल्पस्य सर्वदा ॥ ६६ ॥

स्थितप्रज्ञ पुरुष सर्वदा आकाशके समान निर्विकल्प रहता है। उसकी दृष्टिमें संसार कहाँ और उसका भान कहाँ ? उसके लिये साध्य क्या और साधन क्या ? ॥ ६६ ॥

स जयत्यर्थसंन्यासी पूर्णस्वरसविग्रहः।
अकृत्रिमोऽनवच्छिन्ने समाधिर्यस्य वर्तते ॥ ६७ ॥

जिस तत्त्वज्ञ पुरुषको अपने अखण्ड स्वरूपमें सर्वदा स्वाभाविक समाधि रहती है, जिसका लौकिक, पारलौकिक कोई स्वार्थ नहीं है, जो पूर्ण स्वानन्द-घन है, वास्तवमें वही विजयी है ॥ ६७ ॥

५२४ * गीता-संग्रह *


बहुनात्र किमुक्तेन ज्ञाततत्त्वो महाशयः । भोगमोक्षनिराकाङ्क्षी सदा सर्वत्र नीरसः ॥ ६८ ॥

बहुत कहनेसे क्या लाभ? तत्त्वज्ञ महापुरुष भोग और मोक्ष दोनोंके प्रति आकांक्षारहित होता है और सदा सर्वत्र रागरहित होता है ॥ ६८ ॥

महदादि जगद् द्वैतं नाममात्रविजृम्भितम् । विहाय शुद्धबोधस्य किं कृत्यमवशिष्यते ॥ ६९ ॥

महत्तत्त्वसे लेकर सम्पूर्ण द्वैत-रूप दृश्य जगत् नाममात्रका पसारा है। शुद्ध बोध-स्वरूप तत्त्वज्ञने जब इसका परित्याग ही कर दिया तब भला उसका क्या कर्तव्य शेष है? ॥ ६९ ॥

भ्रमभूतमिदं सर्वं किञ्चिन्नास्तीति निश्चयी । अलक्ष्यस्फुरणः शुद्धः स्वभावेनैव शाम्यति ॥ ७० ॥

यह सम्पूर्ण दृश्य-प्रपंच भ्रममात्र है। यह कुछ नहीं है—ऐसे महानिश्चयसे सम्पन्न शुद्ध पुरुष दृश्यकी स्फूर्तिसे भी रहित हो जाता है और स्वभावसे ही शान्त हो जाता है ॥ ७० ॥

शुद्धस्फुरणरूपस्य दृश्यभावमपश्यतः । क्व विधिः क्व च वैराग्यं क्व त्यागः क्व शमोऽपि वा ॥ ७१ ॥

जो शुद्ध स्फुरण-स्वरूप है, जिसे दृश्य सत्तावान् नहीं मालूम पड़ता, उसके लिये विधि क्या? वैराग्य क्या? त्याग क्या? और शान्ति क्या? ॥ ७१ ॥

स्फुरतोऽनन्तरूपेण प्रकृतिं च न पश्यतः । क्व बन्धः क्व च वा मोक्षः क्व हर्षः क्व विषादिता ॥ ७२ ॥

जो अनन्त रूपसे स्वयं ही स्फुरित हो रहा है और प्रकृतिकी पृथक् सत्ताको नहीं देखता है, उसके लिये बन्ध कहाँ? मोक्ष कहाँ? हर्ष कहाँ और विषाद कहाँ? ॥ ७२ ॥

  • अष्टावक्रगीता * ५२५

बुद्धिपर्यन्तसंसारे मायामात्रं विवर्तते। निर्ममो निरहङ्कारो निष्कामः शोभते बुधः॥ ७३ ॥ संसारका पर्यवसान है बुद्धि और यहाँ मात्र मायाका विवर्त है। इस तत्त्वको जाननेवाला पुरुष काम, ममता और अहंकारसे रहित होकर शोभा पाता है॥ ७३ ॥

अक्षयं गतसन्तापमात्मानं पश्यतो मुनेः। क्व विद्या क्व च वा विश्वं क्व देहोऽहं ममेति वा॥ ७४ ॥ जो तत्त्वज्ञ सन्तापसे रहित अपने अविनाशी स्वरूपको जानता है, उसके लिये विद्या कहाँ, विश्व कहाँ, देह कहाँ और अहंता-ममता कहाँ? ॥ ७४ ॥

निरोधादीनि कर्माणि जहाति जडधीर्यदि। मनोरथान्प्रलापांश्च कर्तुमाप्नोति तत्क्षणात् ॥ ७५ ॥ अज्ञानी पुरुष यदि निरोधादि अभ्यासोंको छोड़ देता है तो वह दूसरे ही क्षण बड़े-बड़े मनोरथ और प्रलाप करने लगता है॥ ७५ ॥

मन्दः श्रुत्वापि तद्वस्तु न जहाति विमूढताम्। निर्विकल्पो बहिर्यत्नादन्तर्विषयलालसः ॥ ७६ ॥ अज्ञानी ब्रह्म और आत्माके एकतारूप तत्त्वका श्रवण करके भी अपनी मूर्खताका परित्याग नहीं करता। वह बाहर तो प्रयत्नसे (कुछ क्षणके लिये) निःसंकल्प हो जाता है, परंतु उसके भीतर विषयोंकी लालसाका बीज बना ही रहता है॥ ७६ ॥

ज्ञानाद् गलितकर्मा यो लोकदृष्ट्यापि कर्मकृत्। नाप्नोत्यवसरं कर्तुं वक्तुमेव न किञ्चन ॥ ७७ ॥ आत्मज्ञानसे जिसकी कर्म-वासना गल गयी है, वह लोकदृष्टिसे कर्म करता रहे तो भी उसके कुछ करने अथवा कहनेके लिये कोई अवसर नहीं मिलता। (वास्तवमें वह अकर्ता और अवक्ता ही है) ॥ ७७ ॥

५२६ * गीता-संग्रह *


क्व तमः क्व प्रकाशो वा हानं क्व च न किञ्चन।
निर्विकारस्य धीरस्य निरातङ्कस्य सर्वदा ॥ ७८ ॥
जो स्थितप्रज्ञ सर्वदा निर्विकार अतएव निरातंक है, उसके लिये अज्ञान कहाँ, ज्ञान कहाँ और त्याग कहाँ? उसके लिये किसीका अस्तित्व नहीं रहता ॥ ७८ ॥

क्व धैर्यं क्व विवेकित्वं क्व निरातङ्कतापि वा।
अनिर्वाच्यस्वभावस्य निःस्वभावस्य योगिनः ॥ ७९ ॥
तत्त्वज्ञको धैर्य कहाँ, विवेक कहाँ? और निर्भयता भी कहाँ? उसका स्वभाव अनिर्वचनीय होता है। वास्तवमें तो वह स्वाभावरहित होता है ॥ ७९ ॥

न स्वर्गो नैव नरको जीवन्मुक्तिर्न चैव हि।
बहुनात्र किमुक्तेन योगदृष्ट्या न किञ्चन ॥ ८० ॥
स्थितप्रज्ञ पुरुषके लिये न स्वर्ग है, न नरक और न जीवन्मुक्ति। इस सम्बन्धमें बहुत कहनेसे क्या लाभ? वस्तु-तत्त्वके साक्षात्कारकी दृष्टिसे कुछ नहीं है ॥ ८० ॥

नैव प्रार्थयते लाभं नालाभेनानुशोचति।
धीरस्य शीतलं चित्तममृतेनैव पूरितम् ॥ ८१ ॥
स्थितप्रज्ञका चित्त ऐसा शीतल रहता है मानो उसमें अमृत ही भर रहा हो। न वह लाभकी अभिलाषा करता है और न हानिका शोक ॥ ८१ ॥

न शान्तं स्तौति निष्कामो न दुष्टमपि निन्दति।
समदुःखसुखस्तृप्तः किञ्चित्कृत्यं न पश्यति ॥ ८२ ॥
स्थितप्रज्ञ पुरुष न सन्तकी स्तुति करता है न दुष्टकी निन्दा। वह दुःख एवं सुखमें सम रहता है, अपने आपमें तृप्त रहता है और वह अपने लिये कुछ कर्तव्य नहीं देखता ॥ ८२ ॥

* अष्टावक्रगीता * ५२७


धीरो न द्वेष्टि संसारमात्मानं न दिदृक्षति।
हर्षामर्षविनिर्मुक्तो न मृतो न च जीवति॥८३॥
स्थितप्रज्ञ न संसारसे द्वेष करता है और न तो आत्म-दर्शन ही करना चाहता है। वह हर्ष एवं रोषसे रहित होता है। वह (सामान्य रूपसे) न तो मृत है न जीवित ॥८३॥

निःस्नेहः पुत्रदारादौ निष्कामो विषयेषु च।
निश्चिन्तः स्वशरीरेऽपि निराशः शोभते बुधः॥८४॥
जो पुत्र-स्त्री आदिके प्रति स्नेहरहित है, विषयोंके प्रति निष्काम है और अपने शरीरके लिये भी निश्चिन्त है, जिसे किसी वस्तुकी आशा नहीं है, ऐसा वह ज्ञानी शोभायमान होता है॥८४॥

तुष्टिः सर्वत्र धीरस्य यथापतितवर्तिनः।
स्वच्छन्दं चरतो देशान् यत्रास्तमितशायिनः॥८५॥
जहाँ सूर्यास्त हुआ, वहाँ सो गया। जहाँ मौज हुई, वहीं विचर गया। जो सामने आया वैसा व्यवहार कर लिया। इस प्रकार स्थितप्रज्ञ सर्वत्र सन्तुष्ट होता है॥८५॥

पततूदेतु वा देहो नास्य चिन्ता महात्मनः।
स्वभावभूमिविश्रान्तिविस्मृताशेषसंसृतेः ॥८६॥
जो अपने स्वतःसिद्ध स्वरूपकी भूमिमें विश्राम करके समस्त प्रपंचका बाध कर चुका है, उस स्थितप्रज्ञ महात्माको शरीर नष्ट हो जाय अथवा बना रहे—ऐसी चिन्ता नहीं होती॥८६॥

अकिञ्चनः कामचारो निर्द्वन्द्वश्छिन्नसंशयः।
असक्तः सर्वभावेषु केवलो रमते बुधः॥८७॥
ज्ञानी पुरुष अकिंचन, स्वेच्छाचारी, निर्द्वन्द्व और सन्देहरहित होता है। वह किसी भी पदार्थमें आसक्त नहीं होता। वह तो केवल आनन्दमें विहार करता है॥८७॥

५२८ * गीता-संग्रह *


निर्ममः शोभते धीरः समलोष्टाश्मकाञ्चनः।
सुभिन्नहृदयग्रन्थिर्विनिर्धूतरजस्तमः ॥ ८८ ॥

स्थितप्रज्ञकी हृदय-ग्रन्थि खुल जाती है। रजोगुण, तमोगुण धुल जाते हैं। वह मिट्टीके ढेले, पत्थर और सोनेको सम-दृष्टिसे देखता है, उसको कहीं ममता नहीं होती। वास्तवमें वही शोभा पाता है॥ ८८॥

सर्वत्रानवधानस्य न किञ्चिद्वासना हृदि।
मुक्तात्मनो वितृप्तस्य तुलना केन जायते ॥ ८९ ॥

जो प्रपंचकी किसी वस्तुपर ध्यान नहीं देता; जो आत्मतृप्त है; उसके हृदयमें तनिक भी वासना नहीं होती—ऐसे मुक्तात्माकी बराबरी किसके साथ की जा सकती है!॥ ८९ ॥

जानन्नपि न जानाति पश्यन्नपि न पश्यति।
ब्रुवन्नपि न च ब्रूते कोऽन्यो निर्वासनादृते ॥ ९० ॥

वासनाहीन स्थितप्रज्ञ पुरुषके अतिरिक्त ऐसा और कौन है जो जानता हुआ भी न जाने, देखता हुआ भी न देखे और बोलता हुआ भी न बोले॥ ९० ॥

भिक्षुर्वा भूपतिर्वापि यो निष्कामः स शोभते।
भावेषु गलिता यस्य शोभनाशोभना मतिः ॥ ९१ ॥

राजा हो चाहे रंक, जो निष्काम है वही शोभा पाता है। जिसकी दृश्य-पदार्थोंमें शुभ और अशुभ बुद्धि समाप्त हो गयी है, वही निष्काम है॥ ९१ ॥

क्व स्वाच्छन्द्यं क्व सङ्कोचः क्व वा तत्त्वनिश्चयः।
निर्व्याजार्जवभूतस्य चरितार्थस्य योगिनः ॥ ९२ ॥

तत्त्वज्ञ निष्कपट, सरल और कृतकृत्य होता है। उसके लिये स्वच्छन्दता कहाँ, संकोच कहाँ और तत्त्व-निश्चय भी कहाँ?॥ ९२ ॥

  • अष्टावक्रगीता * ५२९

आत्मविश्रान्तितृप्तेन निराशेन गतार्तिना। अन्तर्यदनुभूयेत तत्कथं कस्य कथ्यते॥ ९३॥

जो अपने स्वरूपमें विश्राम करके तृप्त है, किसी वस्तुकी आशा नहीं रखता, आर्तिरहित है, वह अपने अन्तःकरणमें जिस आनन्दका अनुभव करता है, वह कैसे किसको बतलाया जाय ? ॥ ९३ ॥

सुप्तोऽपि न सुषुप्तौ च स्वप्नेऽपि शयितो न च। जागरेऽपि न जागर्ति धीरस्तृप्तः पदे पदे॥ ९४॥

स्थितप्रज्ञ पुरुष पद-पदपर तृप्त रहता है। वह सोकर भी नहीं सोता, वह स्वप्न देखकर भी नहीं देखता और वह जाग्रत्-अवस्थामें रहनेपर भी वस्तुतः नहीं जागता ॥ ९४ ॥

ज्ञः सचिन्तोऽपि निश्चिन्तः सेन्द्रियोऽपि निरिन्द्रियः। सबुद्धिरपि निर्बुद्धिः साहङ्कारोऽनहङ्कृती ॥ ९५ ॥

तत्त्वज्ञ सचिन्त होनेपर भी निश्चिन्त होता है, इन्द्रियवान् होनेपर भी निरिन्द्रिय है, बुद्धिमान् होनेपर भी बुद्धिहीन है और साहंकार होनेपर भी निरहंकार रहता है॥ ९५॥

न सुखी न च वा दुःखी न विरक्तो न सङ्गवान्। न मुमुक्षुर्न वा मुक्तो न किञ्चिन्न च किञ्चन॥ ९६ ॥

तत्त्वज्ञ न सुखी होता है न दुःखी। न विरक्त होता है न अनुरक्त। वह न मुमुक्षु है, न मुक्त। न कुछ है, न कुछ नहीं ॥ ९६ ॥

विक्षेपेऽपि न विक्षिप्तः समाधौ न समाधिमान्। जाड्येऽपि न जडो धन्यः पाण्डित्येऽपि न पण्डितः॥ ९७ ॥

तत्त्वज्ञ विक्षेपमें भी विक्षिप्त नहीं होता, समाधिमें भी समाधिस्थ नहीं रहता। वह जड़तामें जड़ नहीं है और पाण्डित्यमें भी पण्डित नहीं है॥ ९७॥

५३० * गीता-संग्रह *


मुक्तो यथास्थितिस्वस्थः कृतकर्तव्यनिर्वृतः।
समः सर्वत्र वैतृष्ण्यान्न स्मरत्यकृतं कृतम्॥ ९८॥

तत्त्वज्ञ समस्त स्थितियोंमें स्वरूपस्थित रहता है। कृतकृत्य होनेके कारण परम शान्त होता है। सर्वत्र सम रहता है। तृष्णाका अभाव होनेके कारण वह 'क्या किया, क्या नहीं किया'—इन बातोंका स्मरण नहीं करता॥ ९८॥

न प्रीयते वन्द्यमानो निन्द्यमानो न कुप्यति।
नैवोद्विजति मरणे जीवने नाभिनन्दति॥ ९९॥

वन्दना करनेसे वह प्रसन्न नहीं होता, निन्दा करनेसे क्रुद्ध नहीं होता, मृत्युसे उद्वेग नहीं करता और जीवनका अभिनन्दन नहीं करता॥ ९९॥

न धावति जनाकीर्णं नारण्यमुपशान्तधीः।
यथा तथा यत्र तत्र सम एवावतिष्ठते॥ १००॥

शान्तचित्त तत्त्वज्ञ न तो जनसमूहकी ओर दौड़ता है और न जंगलकी ओर। जहाँ जिस स्थितिमें वह होता है, वहाँ समचित्त ही रहता है॥ १००॥

॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायां शान्तिशतकं नामाष्टादशं प्रकरणं समाप्तम्॥ १८॥


उन्नीसवाँ प्रकरण

तत्त्वज्ञानीकी विवेक-प्रक्रिया

तत्त्वविज्ञानसन्दंशमादाय हृदयोदरात्।
नानाविधपरामर्शशल्योद्धारः कृतो मया॥ १॥

जैसे सफल चिकित्सक सँड़सीके द्वारा पेटमें घुसे हुए बाणोंको बड़ी चतुरतासे निकाल लेता है, वैसे ही मैंने तत्त्वज्ञानके द्वारा अपने हृदयसे अनेक प्रकारके संकल्प-विकल्प, विचार-विमर्शको निकाल फेंका है॥ १॥

  • अष्टावक्रगीता * ५३१

क्व धर्मः क्व च वा कामः क्व चार्थः क्व विवेकता।
क्व द्वैतं क्व च वाऽद्वैतं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे॥२॥

मैं अपनी महिमामें स्थित हूँ। मेरे लिये धर्म कहाँ ? काम कहाँ ? अर्थ कहाँ? विवेक कहाँ? द्वैत कहाँ और अद्वैत कहाँ?॥२॥

क्व भूतं क्व भविष्यद्वा वर्तमानमपि क्व वा।
क्व देशः क्व च वा नित्यं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे॥३॥

मैं सदा-सर्वदा अपनी महिमामें स्थित हूँ। मेरे लिये भूत, भविष्य तथा वर्तमान-रूप काल कहाँ, देश कहाँ?॥३॥

क्व चात्मा क्व च वानात्मा क्व शुभं क्वाशुभं तथा।
क्व चिन्ता क्व च वाचिन्ता स्वमहिम्नि स्थितस्य मे॥४॥

मैं अपनी महिमामें स्थित हूँ। मेरे लिये आत्मा-अनात्मा, शुभ-अशुभ चिन्ता एवं अचिन्ताका अस्तित्व ही कहाँ है?॥४॥

क्व स्वप्नः क्व सुषुप्तिर्वा क्व च जागरणं तथा।
क्व तुरीयं भयं वापि स्वमहिम्नि स्थितस्य मे॥५॥

मैं अपनी महिमामें स्थित हूँ। मेरे लिये कहाँ स्वप्न और कहाँ सुषुप्ति ? कहाँ जागरण और कहाँ तुरीय ? मेरे लिये भय ही कहाँ है?॥५॥

क्व दूरं क्व समीपं वा बाह्यं क्वाभ्यन्तरं क्व वा।
क्व स्थूलं क्व च वा सूक्ष्मं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे॥६॥

मैं अपनी महिमामें स्थित हूँ। मेरे लिये कहाँ दूर और कहाँ समीप? कहाँ बाह्य और कहाँ आभ्यन्तर? कहाँ स्थूल और कहाँ सूक्ष्म ?॥६॥

क्व मृत्युर्जीवितं वा क्व लोकाः क्वास्य क्व लौकिकम्।
क्व लयः क्व समाधिर्वा स्वमहिम्नि स्थितस्य मे॥७॥

मैं अपनी महिमामें स्थित हूँ। मेरे लिये कहाँ मृत्यु और कहाँ

५३२ * गीता-संग्रह *


जीवन ? कहाँ लोक और कहाँ लौकिक विषयवस्तु ? कहाँ लय और कहाँ समाधि ? ॥ ७ ॥
अलं त्रिवर्गकथया योगस्य कथयाप्यलम्।
अलं विज्ञानकथया विश्रान्तस्य ममात्मनि ॥ ८ ॥
अर्थ, धर्म, कामकी बात बन्द करो। योगकी कथा भी अनावश्यक है। अब विज्ञानकी चर्चा भी बहुत हो चुकी। बस, मैं तो अपने स्वरूपमें स्थित हूँ॥ ८ ॥
॥ इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां ब्रह्मविद्यायामात्मविश्रान्तिनाम एकोनविंशतिकं प्रकरणं समाप्तम् ॥ १९ ॥


बीसवाँ प्रकरण

स्वस्वरूपमें स्थित पुरुषकी स्थिति

क्व भूतानि क्व देहो वा क्वेन्द्रियाणि क्व वा मनः।
क्व शून्यं क्व च नैराश्यं मत्स्वरूपे निरञ्जने ॥ १ ॥
मेरे निर्मल स्वरूपमें पंचभूत कहाँ ? देह कहाँ ? इन्द्रियाँ कहाँ ? मन कहाँ ? शून्य कहाँ ? और निराशा भी कहाँ ? ॥ १ ॥

क्व शास्त्रं क्वात्मविज्ञानं क्व वा निर्विषयं मनः।
क्व तृप्तिः क्व वितृष्णत्वं गतद्वन्द्वस्य मे सदा ॥ २ ॥
मैं सर्वदा निर्द्वन्द्व हूँ। मेरे लिये कहाँ शास्त्र और कहाँ आत्म-विज्ञान ? कहाँ मनकी निर्विषयता, कहाँ तृप्ति और कहाँ तृष्णासे रहित होना ? ॥ २ ॥

क्व विद्या क्व च वाविद्या क्वाहं क्वेदं मम क्व वा।
क्व बन्धः क्व च वा मोक्षः स्वरूपस्य क्व रूपिता ॥ ३ ॥
स्वरूपमें विद्या कहाँ ? अविद्या कहाँ ? अहं कहाँ और इदं कहाँ ? ममता कहाँ ? बन्धन कहाँ ? मोक्ष कहाँ ? उसमें रूपका होना भी कहाँ है ? ॥ ३ ॥

  • अष्टावक्रगीता * ५३३

क्व प्रारब्धानि कर्माणि जीवन्मुक्तिरपि क्व वा।
क्व तद्विदेहकैवल्यं निर्विशेषस्य सर्वदा॥४॥
जो सर्वदा निर्विशेष एकरस वस्तु है, उसमें प्रारब्ध-कर्म कहाँ? जीवन्मुक्ति कहाँ और विदेहकैवल्य भी कहाँ?॥४॥

क्व कर्ता क्व च वा भोक्ता निष्क्रियं स्फुरणं क्व वा।
क्वापरोक्षं फलं वा क्व निःस्वभावस्य मे सदा॥५॥
मैं सदा-सर्वदा एकरस, स्वभावरहित हूँ। मुझमें कर्ता कहाँ? भोक्ता कहाँ? निष्क्रिय स्फुरण भी कहाँ? अपरोक्ष ज्ञान कहाँ और फल-ज्ञान कहाँ?॥५॥

क्व लोकः क्व मुमुक्षुर्वा क्व योगी ज्ञानवान् क्व वा।
क्व बद्धः क्व च वा मुक्तः स्वस्वरूपेऽहमद्वये॥६॥
अद्वितीय स्वस्वरूपमें कहाँ लोक और कहाँ मुमुक्षु? कहाँ योगी और कहाँ ज्ञानवान्? कहाँ बद्ध और कहाँ मुक्त?॥६॥

क्व सृष्टिः क्व च संहारः क्व साध्यं क्व च साधनम्।
क्व साधकः क्व सिद्धिर्वा स्वस्वरूपेऽहमद्वये॥७॥
अद्वितीय स्वस्वरूपमें कहाँ सृष्टि और कहाँ संहार? कहाँ साध्य और कहाँ साधन? कहाँ साधक और कहाँ सिद्धि?॥७॥

क्व प्रमाता प्रमाणं वा क्व प्रमेयं क्व च प्रमा।
क्व किञ्चित् क्व न किञ्चिद्वा सर्वदा विमलस्य मे॥८॥
मैं सर्वदा शुद्धस्वरूप हूँ। मुझमें न प्रमाता है न प्रमाण। न प्रमेय है न प्रमा। न कुछ है, न कुछ नहीं॥८॥

क्व विक्षेपः क्व चैकाग्र्यं क्व निर्बोधः क्व मूढता।
क्व हर्षः क्व विषादो वा सर्वदा निष्क्रियस्य मे॥९॥
मैं सर्वदा निष्क्रिय हूँ। मुझमें न विक्षेप है न एकाग्रता। न बोध है न मूढ़ता। न हर्ष है न विषाद॥९॥