भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

DevanagariHindipublished675 पृष्ठ

पृष्ठ 555, कुल 675 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 555

५५४ * गीता-संग्रह *


धर्मार्थकाममोक्षांश्च द्विपदादिचराचरम्।
मन्यन्ते योगिनः सर्वं मरीचिजलसन्निभम्॥ ७१ ॥

योगिजन धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्षको तथा द्विपद आदि जंगम प्राणियों और [वृक्ष, पर्वत] आदि स्थावर पदार्थोंको मृगतृष्णाके जलके समान [मिथ्या] मानते हैं॥ ७१ ॥

अतीतानागतं कर्म वर्तमानं तथैव च।
न करोमि न भुञ्जामि इति मे निश्चला मतिः॥ ७२ ॥

मैं भूत, भविष्य तथा वर्तमान कालके कर्मोंको न तो करता हूँ और न इनके फलका भोग ही करता हूँ—इस प्रकारकी मेरी दृढ़ बुद्धि है॥ ७२ ॥

शून्यागारे समरसपूत-
स्तिष्ठन्नेकः सुखमवधूतः।
चरति हि नग्नस्त्यक्त्वा गर्वं
विन्दति केवलमात्मनि सर्वम्॥ ७३ ॥

समतारूपी रसके द्वारा पवित्र हुआ अवधूत एकान्त स्थानमें सुखपूर्वक अकेला रहता है। अभिमानका त्याग करके वह अनावृत विचरण करता है और केवल अपनेमें ही सबका अनुभव करता है॥ ७३ ॥

त्रितयतुरीयं नहि नहि यत्र
विन्दति केवलमात्मनि तत्र।
धर्माधर्मौ नहि नहि यत्र
बद्धो मुक्तः कथमिह तत्र॥ ७४ ॥

जिस जीवन्मुक्तताकी दशामें जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय—ये अवस्थाएँ नहीं रह जाती हैं, उस दशामें वह केवल अपने आत्मामें ब्रह्मानन्दको प्राप्त होता है। जिस अवस्थामें धर्म-अधर्मका भाव नहीं रहता, उस अवस्थामें बद्ध और मुक्तका भाव कैसे रह सकता है ?॥ ७४ ॥

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ) · पृष्ठ 555, कुल 675 में से · BharatKosha