भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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  • अवधूतगीता (१) * ५५५

विन्दति विन्दति नहि नहि मन्त्रं
छन्दो लक्षणं नहि नहि तन्त्रम्।
समरसमग्नो भावितपूतः
प्रलपितमेतत्परमवधूतः ॥ ७५ ॥

आत्मरसमें मग्न तथा ध्यानके द्वारा पवित्र हुआ जीवन्मुक्त अवधूत कोई मन्त्र नहीं प्राप्त करता है और न तो किसी छन्दरूपी तन्त्रको ही प्राप्त करता है। उस (परब्रह्मको प्राप्त हुए) अवधूतने ही इस (गीता)-का कथन किया है॥ ७५ ॥

सर्वशून्यमशून्यं च सत्यासत्यं न विद्यते।
स्वभावभावतः प्रोक्तं शास्त्रसंवित्तिपूर्वकम् ॥ ७६ ॥

सम्पूर्ण जगत् शून्यरूप है और अशून्यरूप भी है। (परब्रह्ममें) न तो सत्य विद्यमान है और न असत्य। अवधूतने अपने अनुभवसे तथा शास्त्रज्ञानके अनुसार इसका वर्णन किया है॥ ७६ ॥

॥ इति श्रीदत्तात्रेयविरचितायामवधूतगीतायामात्मसंवित्त्युपदेशो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥


दूसरा अध्याय

गुणोंकी ग्राहकता, ब्रह्मका स्वरूप, ब्रह्मानुभूति-वर्णन, परमज्ञानप्रदाता गुरुकी प्रशंसा तथा आत्मतत्त्वकी विलक्षणता

अवधूत उवाच

बालस्य वा विषयभोगरतस्य वापि
मूर्खस्य सेवकजनस्य गृहस्थितस्य।
एतद् गुरोः किमपि नैव न चिन्तनीयं
रत्नं कथं त्यजति कोऽप्यशुचौ प्रविष्टम् ॥ १ ॥

अवधूत श्रीदत्तात्रेयजी बोले—बालक, विषय-भोगमें लीन, मूर्ख, सेवकजन अथवा गृहस्थ—इस प्रकारके गुरुओंसे कुछ भी लाभ