गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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तथा परमार्थतत्त्वस्वरूप है। [आत्मस्वरूप] मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ तथा आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥२०॥
दीर्घो लघुः पुनरितीह न मे विभागो विस्तारसङ्कटमितीह न मे विभागः। कोणं हि वर्तुलमितीह न मे विभागो ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥२१॥
यह दीर्घ है और यह लघु है—इस प्रकारका भेद इसी लोकमें है, मुझमें नहीं है, विस्तार और संकोच—ऐसा विभाग भी इस लोकमें है, मुझमें नहीं है और कोण तथा गोलाकार—ऐसा विभाग भी इसी संसारमें है, मुझमें नहीं है; मैं तो ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥२१॥
मातापितादि तनयादि न मे कदाचि- ज्जातं मृतं न च मनो न च मे कदाचित्। निर्व्याकुलं स्थिरमिदं परमार्थतत्त्वं ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥२२॥
मेरे माता, पिता, पुत्र आदि न तो कभी उत्पन्न हुए और न मृत्युको ही प्राप्त हुए, मेरा मन कभी व्याकुलतासे रहित तथा स्थिर भी नहीं है। [एकमात्र] यह आत्मा ही परमार्थतत्त्वस्वरूप है; मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ तथा आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥२२॥
शुद्धं विशुद्धमविचारमनन्तरूपं निर्लेपलेपमविचारमनन्तरूपम् । निष्खण्डखण्डमविचारमनन्तरूपं ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम्॥२३॥
यह चेतन आत्मा शुद्ध है, अति शुद्ध है, विचाररहित और अनन्तरूप है। यह निर्लेप होकर भी सम्बन्धयुक्त है, विचारसे परे