गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* अवधूतगीता ( १ ) * ५७३
और अनन्तरूप है। यह नाशसे रहित और नाशवान्, अचिन्त्य तथा अनन्तरूप है। [आत्मस्वरूप] मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ तथा आकाशके समान [व्यापक] हूँ ॥ २३ ॥
ब्रह्मादयः सुरगणाः कथमत्र सन्ति स्वर्गादयो वसतयः कथमत्र सन्ति। यद्येकरूपममलं परमार्थतत्त्वं ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ २४ ॥
जब यह आत्मतत्त्व एकरूप, विशुद्ध तथा परमार्थस्वरूप है, तब ब्रह्मा आदि देववृन्द इसमें कैसे हो सकते हैं और स्वर्ग आदि स्थान भी इसमें कैसे हो सकते हैं? मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ ॥ २४ ॥
निर्नेति नेति विमलो हि कथं वदामि निःशेषशेषविमलो हि कथं वदामि। निर्लिङ्गलिङ्गविमलो हि कथं वदामि ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ २५ ॥
यह आत्मतत्त्व नेति और इतिसे परे है, यह सम्पूर्ण और शेषसे भी परे है तथा यह आकार और निराकारसे भी परे है। इसे मैं कैसे अभिव्यक्त करूँ? मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ ॥ २५ ॥
निष्कर्मकर्मपरमं सततं करोमि निःसङ्गसङ्गरहितं परमं विनोदम्। निर्देहदेहरहितं सततं विनोदं ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ २६ ॥
आत्मस्वरूप मैं कर्मसे रहित होकर भी सदा महत्कर्म करता रहता हूँ, मैं निःसंग होकर भी परमलीलाका आनन्द लेता हूँ,