गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अवधूतगीता (१) * ५७९
ध्याता न ते हि हृदये न च ते समाधि-
र्ध्यानं न ते हि हृदये न बहिः प्रदेशः।
ध्येयं न चेति हृदये न हि वस्तु कालो
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ४१ ॥
तुम्हारे हृदयमें न कोई ध्यान करनेवाला है, न कोई समाधि है, न कोई ध्यान है और न कोई बाह्य प्रदेश ही है; इसी प्रकार तुम्हारे हृदयमें न कोई ध्येय है, न कोई वस्तु है और न काल ही है। मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ और आकाशके समान [व्यापक] हूँ॥ ४१ ॥
यत्सारभूतमखिलं कथितं मया ते
न त्वं न मे न महतो न गुरुर्न शिष्यः।
स्वच्छन्दरूपसहजं परमार्थतत्त्वं
ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥ ४२ ॥
जो कुछ भी सारभूत था, वह सब मैंने तुमसे कह दिया। वास्तवमें न तुम हो, न मैं हूँ, न कोई पूज्य है, न कोई गुरु है और न कोई शिष्य है। मैं सहज, परमस्वतन्त्र तथा परमार्थस्वरूप हूँ। [ब्रह्मस्वरूप] मैं ज्ञानरूपी अमृत हूँ, समरस हूँ तथा आकाशके समान [व्यापक] हूँ [तुम भी वही हो] ॥ ४२ ॥
कथमिह परमार्थं तत्त्वमानन्दरूपं
कथमिह परमार्थं नैवमानन्दरूपम्।
कथमिह परमार्थं ज्ञानविज्ञानरूपं
यदि परमहमेकं वर्तते व्योमरूपम् ॥ ४३ ॥
जब मैं ही एकमात्र परमतत्त्व आकाशकी भाँति सर्वव्याप्त हूँ, तब मैं कैसे कहूँ कि यह परमार्थतत्त्व आनन्दस्वरूप है अथवा नहीं और यह ज्ञान अथवा विज्ञान (साधना)-से प्राप्य है अथवा नहीं॥ ४३ ॥