गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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दहनपवनहीनं विद्धि विज्ञानमेक- मवनिजलविहीनं विद्धि विज्ञानरूपम्। समगमनविहीनं विद्धि विज्ञानमेकं गगनमिव विशालं विद्धि विज्ञानमेकम्॥ ४४॥
[हे तात !] तुम विज्ञानस्वरूप आत्माको अग्नि तथा वायुसे रहित और एक समझो; उसी प्रकार इस विज्ञानस्वरूप आत्माको पृथ्वी तथा जलसे रहित समझो; इस विज्ञानस्वरूप आत्माको सतत गतिसे विहीन समझो और इस विज्ञानस्वरूप आत्माको आकाशकी भाँति विशाल तथा एक जानो॥ ४४॥
न शून्यरूपं न विशून्यरूपं न शुद्धरूपं न विशुद्धरूपम्। रूपं विरूपं न भवामि किञ्चित् स्वरूपरूपं परमार्थतत्त्वम्॥ ४५॥
मैं न शून्यरूप हूँ तथा न अशून्यरूप हूँ; न शुद्धरूप हूँ और न अशुद्ध रूप हूँ; मैं रूप तथा विरूप कुछ भी नहीं हूँ। मैं स्वरूपमात्र हूँ और परमार्थतत्त्व हूँ॥ ४५॥
मुञ्च मुञ्च हि संसारं त्यागं मुञ्च हि सर्वथा। त्यागात्यागविषं शुद्धममृतं सहजं ध्रुवम्॥ ४६॥
[हे तात !] तुम संसारका त्याग कर दो, त्याग कर दो; पुनः उस त्यागका भी सर्वथा त्याग कर दो; त्याग तथा अत्यागको विषरूप जानकर उन्हें छोड़ दो। तुम शुद्धस्वभाव, अमृतरूप, सहज तथा नित्य हो॥ ४६॥
॥ इति श्रीदत्तात्रेयविरचितायामवधूतगीतायामात्मसंवित्त्युपदेशो नाम तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥