भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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पृष्ठ 582

* अवधूतगीता (१) * ५८१


चौथा अध्याय

आत्मज्ञानीकी सर्वत्र समदृष्टि तथा आत्मतत्त्वकी अकथनीयताकी विवेचना

अवधूत उवाच

नावाहनं नैव विसर्जनं वा पुष्पाणि पत्राणि कथं भवन्ति।
ध्यानानि मन्त्राणि कथं भवन्ति समासमं चैव शिवार्चनं च॥ १ ॥

अवधूत श्रीदत्तात्रेयजी बोले— [ चेतन ब्रह्म सर्वव्यापी है, अतः ] उस ब्रह्मके न तो आवाहनकी और न उसके विसर्जनकी ही कोई आवश्यकता है। पुष्प तथा पत्र आदि भी किसलिये अर्पण होते हैं। उसके ध्यान तथा मन्त्र भी किस प्रकार होते हैं अर्थात् उसकी कोई आवश्यकता नहीं। सभीमें समदृष्टि रखना ही कल्याणस्वरूप चेतन ब्रह्मका पूजन है ॥ १ ॥

न केवलं बन्धविबन्धमुक्तो न केवलं शुद्धविशुद्धमुक्तः।
न केवलं योगवियोगमुक्तः स वै विमुक्तो गगनोपमोऽहम्॥ २ ॥

मैं केवल आसक्ति-अनासक्ति, शुद्ध-अशुद्ध और योग-वियोगसे ही रहित नहीं हूँ, मैं तो आकाशकी भाँति (सर्वव्यापक) और सर्वथा मुक्त हूँ॥ २ ॥

सञ्जायते सर्वमिदं हि तथ्यं सञ्जायते सर्वमिदं वितथ्यम्।
एवं विकल्पो मम नैव जातः स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ ३ ॥

यह सम्पूर्ण जगत्-प्रपंच सत्यरूपमें उत्पन्न होता है अथवा यह मिथ्या उत्पन्न होता है—इस प्रकारका विकल्प मुझे कभी उत्पन्न नहीं हुआ; क्योंकि मैं स्वभावसे मुक्तरूप हूँ और विकाररहित हूँ॥ ३ ॥