गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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न साञ्जनं चैव निरञ्जनं वा न चान्तरं वापि निरन्तरं वा। अन्तर्विभिन्नं न हि मे विभाति स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ ४॥
मैं न तो मायामलसे युक्त हूँ और न मायामलसे रहित ही हूँ, मैं न व्यवधान हूँ और न व्यवधानरहित हूँ। मुझे व्यवधान तथा भेदका भान नहीं होता है। मैं स्वभावसे मुक्तरूप हूँ और विकाररहित हूँ॥ ४॥
अबोधबोधो मम नैव जातो बोधस्वरूपं मम नैव जातम्। निर्बोधबोधं च कथं वदामि स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ ५॥
अज्ञानका बोध मुझे कभी नहीं हुआ, मैं बोधस्वरूप हूँ—ऐसा ज्ञान भी मुझे कभी नहीं हुआ। मैं अपनेको ज्ञानसे रहित अथवा बोध-वाला किस प्रकार कहूँ; [क्योंकि] मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥ ५॥
न धर्मयुक्तो न च पापयुक्तो न बन्धयुक्तो न च मोक्षयुक्तः। युक्तं त्वयुक्तं न च मे विभाति स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ ६॥
मैं धर्मयुक्त नहीं हूँ, पापयुक्त नहीं हूँ, बन्धनयुक्त नहीं हूँ और मोक्षयुक्त भी नहीं हूँ। मुझे युक्त तथा अयुक्तका भान नहीं होता है; [क्योंकि] मैं स्वभावसे मुक्तरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥ ६॥
परापरं वा न च मे कदाचिन् मध्यस्थभावो हि न चारिमित्रम्।