गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अवधूतगीता (१) * ५८५
किंचिन्मात्र भी छिपा हुआ नहीं है। हे मित्र! मैं उसे सम अथवा विषम भी कैसे कह सकता हूँ; मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप तथा विकारसे रहित हूँ॥ १३॥
जितेन्द्रियोऽहं त्वजितेन्द्रियो वा न संयमो मे नियमो न जातः। जयाजयौ मित्र कथं वदामि स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ १४॥
मैं जितेन्द्रिय हूँ अथवा अजितेन्द्रिय हूँ—यह कैसे कहूँ, (क्योंकि) मेरा कोई संयम अथवा नियम नहीं है। हे मित्र! मैं जय तथा पराजयका किस प्रकार कथन करूँ; मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥ १४॥
अमूर्तमूर्तिर्न च मे कदाचि- दाद्यन्तमध्यं न च मे कदाचित्। बलाबलं मित्र कथं वदामि स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ १५॥
मैं कभी भी मूर्तिरहित अथवा मूर्तिमान् नहीं हूँ; मेरा कभी भी आदि, अन्त अथवा मध्य नहीं है। हे मित्र! मैं बलवान् तथा निर्बलका भी कथन किस प्रकार करूँ; मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ और विकाररहित हूँ॥ १५॥
मृतामृतं वापि विषाविषं च सञ्जायते तात न मे कदाचित्। अशुद्धशुद्धं च कथं वदामि स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ १६॥
हे तात! मुझमें मरनेका, न मरनेका, विषका अथवा विषरहितका भाव कभी उत्पन्न नहीं होता है। मैं अशुद्ध अथवा शुद्धका भी कथन कैसे करूँ; मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥ १६॥