गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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स्वप्नः प्रबोधो न च योगमुद्रा
नक्तं दिवा वापि न मे कदाचित्।
अतुर्यतुर्यं च कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ १७ ॥
मुझमें न स्वप्न है, न जाग्रत् है, न योगमुद्रा है, न रात है अथवा न दिन ही है; इसी प्रकार मैं तुरीय अथवा अतुरीय अवस्थाको भी किस प्रकार कहूँ? मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥ १७॥
संविद्धि मां सर्वविसर्वमुक्तं
माया विमाया न च मे कदाचित्।
सन्ध्यादिकं कर्म कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ १८ ॥
[हे तात!] तुम मुझको सब प्रकार सभी (प्रपंचों)-से मुक्त जानो; माया तथा विमाया भी मुझमें कभी उत्पन्न नहीं हुए। मैं सन्ध्या आदि कर्मका भी कथन किस प्रकार करूँ; मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥ १८॥
संविद्धि मां सर्वसमाधियुक्तं
संविद्धि मां लक्ष्यविलक्ष्यमुक्तम्।
योगं वियोगं च कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ १९ ॥
[हे तात!] तुम मुझको सम्पूर्ण समाधिसे युक्त जानो और मुझको लक्ष्यभाव तथा विलक्ष्यभावसे रहित जानो। मैं योग तथा वियोगको भी किस प्रकार कहूँ; मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥ १९॥