गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अवधूतगीता ( १ ) * ५८७
मूर्खोऽपि नाहं न च पण्डितोऽहं
मौनं विमौनं न च मे कदाचित्।
तर्कं वितर्कञ्च कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥२०॥
मैं न तो मूर्ख हूँ और न पण्डित हूँ, मौन तथा वाचालका भाव भी मुझमें कभी नहीं हुआ। मैं तर्क और वितर्कका कथन किस प्रकार करूँ? मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप तथा विकाररहित हूँ॥२०॥
पिता च माता च कुलं न जाति-
र्जन्मादि मृत्युर्न च मे कदाचित्।
स्नेहं विमोहं च कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥२१॥
[ब्रह्मस्वरूप] मेरा न कोई पिता है, न माता है, न कुल है और न जाति है; मेरा जन्म आदि तथा मृत्यु कभी नहीं हुए। मैं स्नेह तथा वैराग्यका कथन किस प्रकार करूँ? मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥२१॥
अस्तं गतो नैव सदोदितोऽहं
तेजो वितेजो न च मे कदाचित्।
सन्ध्यादिकं कर्म कथं वदामि
स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥२२॥
मैं कभी भी लयभावको प्राप्त नहीं होता हूँ, अपितु सदा उदित रहता हूँ। तेज अथवा निस्तेज कभी भी मुझमें नहीं होता। मैं सन्ध्या आदि कर्मका कथन किस प्रकार करूँ? मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ तथा विकाररहित हूँ॥२२॥
असंशयं विद्धि निराकुलं मा-
मसंशयं विद्धि निरन्तरं माम्।