गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८८ * गीता-संग्रह *
असंशयं विद्धि निरञ्जनं मां स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ २३ ॥
हे तात ! तुम मुझको निस्सन्देह व्याकुलतासे रहित जानो, निश्चय ही मुझको शाश्वत जानो और निस्सन्देह मुझको मायामलसे रहित जानो; मैं स्वभावसे मुक्तस्वरूप तथा विकाररहित हूँ॥ २३ ॥
ध्यानानि सर्वाणि परित्यजन्ति शुभाशुभं कर्म परित्यजन्ति। त्यागामृतं तात पिबन्ति धीराः स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ २४ ॥
हे तात ! आत्मज्ञानी धीर पुरुष सभी ध्यानोंका त्याग कर देते हैं, सभी शुभाशुभ कर्मोंको छोड़ देते हैं और इस प्रकार वे (सर्व) त्यागरूपी अमृतका पान करते हैं। मैं तो स्वभावसे मुक्तस्वरूप हूँ और विकाररहित हूँ॥ २४॥
विन्दति विन्दति नहि नहि यत्र छन्दो लक्षणं नहि नहि तत्र। समरसमग्नो भावितपूतः प्रलपति तत्त्वं परमवधूतः ॥ २५ ॥
पवित्रतासे युक्त तथा एकरस आत्मानन्दमें मग्न परम अवधूत उस आत्मामें कुछ भी नहीं देखता है और वहाँ कुछ भी नहीं प्राप्त करता है; क्योंकि वहाँ छन्दादि लक्षण वस्तुतः नहीं हैं। वह अवधूत तो एकमात्र परमतत्त्वका ही कथन करता है ॥ २५ ॥
॥ इति श्रीदत्तात्रेयविरचितायामवधूतगीतायामात्मसंवित्त्युपदेशो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥