गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अवधूतगीता ( १ ) * ५८९
पाँचवाँ अध्याय
आत्मज्ञानीद्वारा अपने मनको प्रबोध
अवधूत उवाच
ओमिति गदितं गगनसमं त-
न्न परापरसारविचार इति।
अविलासविलासनिराकरणं
कथमक्षरबिन्दुसमुच्चरणम् ॥ १ ॥
अवधूत श्रीदत्तात्रेयजी बोले— 'ओम्' इस प्रकार जो उच्चरित किया गया है, वह आकाशके समान व्यापक है; उसमें पर, अपर तथा सारका विचार नहीं है; और जगत्-प्रपंचके विलास तथा विलयका उसीमें निराकरण भी होता है। (उसके) अक्षर-बिन्दुका उच्चारण किस प्रकार होगा ? ॥ १ ॥
इति तत्त्वमसिप्रभृतिश्रुतिभिः
प्रतिपादितमात्मनि तत्त्वमसि।
त्वमुपाधिविवर्जितसर्वसमं
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ २ ॥
तत्त्वमसि आदि श्रुतियोंने प्रतिपादित किया है कि आत्मामें वह [ब्रह्म] तुम ही हो। तुम उपाधिसे रहित सभीमें सम हो। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ २ ॥
अधऊर्ध्वविवर्जितसर्वसमं
बहिरन्तरवर्जितसर्वसमम् ।
यदि चैकविवर्जितसर्वसमं
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ ३ ॥
जो सबमें समरूप है, वह (आत्मा) नीचे तथा ऊपरके भेदसे रहित, बाहर तथा भीतरके भेदसे रहित और एकत्वभावसे भी रहित है; हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ ३ ॥