भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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* अवधूतगीता (१) * ५९१


इह सर्वनिरन्तरमोक्षपदं
लघुदीर्घविचारविहीन इति।
न हि वर्तुलकोणविभाग इति
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ ७ ॥

यह चेतन आत्मा सर्वरूप, शाश्वत तथा मोक्षस्वरूप है। यह लघु तथा दीर्घके विचारसे रहित है। इसमें गोल तथा कोणका विभाग भी नहीं है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ ७ ॥

इह शून्यविशून्यविहीन इति
इह शुद्धविशुद्धविहीन इति।
इह सर्वविसर्वविहीन इति
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ ८ ॥

यह आत्मा शून्य तथा अशून्यसे रहित है; यह शुद्ध तथा अशुद्धसे विहीन है; यह सर्व तथा विसर्वसे भी रहित है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ ८ ॥

न हि भिन्नविभिन्नविचार इति
बहिरन्तरसन्धिविचार इति।
अरिमित्रविवर्जितसर्वसमं
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ ९ ॥

यह चेतन आत्मा भिन्न है अथवा अभिन्न है—यह विचार नहीं हो सकता; यह बाहर है अथवा भीतर अथवा सन्धिस्थानपर है—यह विचार भी नहीं हो सकता। यह शत्रु-मित्रके भावसे रहित सर्वसम है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ ९ ॥

न हि शिष्यविशिष्यस्वरूप इति
न चराचरभेदविचार इति।