भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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५९२ * गीता-संग्रह *


इह सर्वनिरन्तरमोक्षपदं
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ १० ॥

उस चेतन आत्मामें शिष्यभाव अथवा शिष्यत्वसे रहित होनेका भाव नहीं है। उसमें चर-अचरके भेदका विचार भी नहीं है। वह सर्वरूप, शाश्वत तथा मोक्षस्वरूप है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ १० ॥

ननु रूपविरूपविहीन इति
ननु भिन्नविभिन्नविहीन इति।
ननु सर्गविसर्गविहीन इति
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ ११ ॥

वह चेतन आत्मा निश्चय ही रूप तथा विरूपसे रहित है; वह निश्चय ही भेद तथा अभेदसे भी रहित है; वह निश्चय ही उत्पत्ति तथा प्रलयसे भी रहित है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ ११ ॥

न गुणागुणपाशनिबन्ध इति
मृतजीवनकर्म करोति कथम्।
इति शुद्धनिरञ्जनसर्वसमं
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ १२ ॥

उस चेतन आत्मामें गुण तथा अगुणके पाशका बन्धन नहीं है; वह मृतकके तथा जीवितके कर्म कैसे कर सकता है? वह शुद्ध, मायामलसे रहित तथा सर्वत्र समरूप है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ १२ ॥

इह भावविभावविहीन इति
इह कामविकामविहीन इति।

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