गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
५९२ * गीता-संग्रह *
इह सर्वनिरन्तरमोक्षपदं
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ १० ॥
उस चेतन आत्मामें शिष्यभाव अथवा शिष्यत्वसे रहित होनेका भाव नहीं है। उसमें चर-अचरके भेदका विचार भी नहीं है। वह सर्वरूप, शाश्वत तथा मोक्षस्वरूप है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ १० ॥
ननु रूपविरूपविहीन इति
ननु भिन्नविभिन्नविहीन इति।
ननु सर्गविसर्गविहीन इति
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ ११ ॥
वह चेतन आत्मा निश्चय ही रूप तथा विरूपसे रहित है; वह निश्चय ही भेद तथा अभेदसे भी रहित है; वह निश्चय ही उत्पत्ति तथा प्रलयसे भी रहित है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ ११ ॥
न गुणागुणपाशनिबन्ध इति
मृतजीवनकर्म करोति कथम्।
इति शुद्धनिरञ्जनसर्वसमं
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ १२ ॥
उस चेतन आत्मामें गुण तथा अगुणके पाशका बन्धन नहीं है; वह मृतकके तथा जीवितके कर्म कैसे कर सकता है? वह शुद्ध, मायामलसे रहित तथा सर्वत्र समरूप है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ १२ ॥
इह भावविभावविहीन इति
इह कामविकामविहीन इति।
- अवधूतगीता (१) * ५१३
इह बोधतमं खलु मोक्षसमं किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ १३ ॥
वह आत्मा भाव तथा अभावसे रहित है; वह काम तथा अकामसे रहित है। वह आत्मा परम बोधस्वरूप तथा मोक्षस्वरूप है। हे मन ! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ १३ ॥
इह तत्त्वनिरन्तरतत्त्वमिति न हि सन्धिविसन्धिविहीन इति। यदि सर्वविवर्जितसर्वसमं किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ १४ ॥
इस आत्मामें यह तत्त्व है या निरन्तरता ही तत्त्व है—ऐसा भेद नहीं होता है; यह सन्धि तथा विसन्धिसे रहित है। यदि यह सर्वसे रहित तथा सर्वसम है, तब हे मन ! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ १४ ॥
अनिकेतकुटी परिवारसमं इह सङ्गविसङ्गविहीनपरम्। इह बोधविबोधविहीनपरं किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ १५ ॥
तुम्हारे लिये एकान्त कुटियामें रहना या परिवारके बीच रहना समान है, उसी तरह संग-असंग और ज्ञान-अज्ञानके द्वन्द्वसे परे तुम्हारी स्थिति है। तब हे मन ! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ १५ ॥
अविकारविकारमसत्यमिति अविलक्षविलक्षमसत्यमिति । यदि केवलमात्मनि सत्यमिति किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ १६ ॥
विकाररहित और विकारवान् दोनों ही असत्य हैं, प्रत्यक्ष और
५९४ * गीता-संग्रह *
परोक्ष भी दोनों असत्य ही हैं। जब सत्य केवल आत्मस्वरूपमें ही निहित है, तब हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ १६ ॥
इह सर्वसमं खलु जीव इति
इह सर्वनिरन्तरजीव इति।
इह केवलनिश्चलजीव इति
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ १७ ॥
इस जगत्में निश्चय ही आत्मा सबमें समरूप है, आत्मा सबमें निरन्तर विद्यमान है। इस जगत्में केवल निश्चल आत्मा ही है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ १७ ॥
अविवेकविवेकमबोध इति
अविकल्पविकल्पमबोध इति।
यदि चैकनिरन्तरबोध इति
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ १८ ॥
अविवेक तथा विवेक अज्ञान ही है और विकल्पका अभाव तथा विकल्प भी अज्ञान ही है। यदि एकमात्र शाश्वत ज्ञान ही है तो हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ १८ ॥
न हि मोक्षपदं न हि बन्धपदं
न हि पुण्यपदं न हि पापपदम्।
न हि पूर्णपदं न हि रिक्तपदं
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ १९ ॥
इस आत्मामें न मोक्षपद है न बन्धपद है, न पुण्यपद है न पापपद है और न पूर्णपद है न रिक्तपद है; तो फिर हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ १९ ॥
* अवधूतगीता (१) * ५९५
यदि वर्णविवर्णविहीनसमं यदि कारणकार्यविहीनसमम्। यदि भेदविभेदविहीनसमं किमु रोदिषि मानस सर्वसमम्॥ २०॥
यदि आत्मा वर्ण अथवा वर्णविशेषके अभावसे रहित है और सम है; यदि वह कारण तथा कार्यसे रहित और सम है; यदि वह भेद तथा विभेदसे रहित है और सम है तो हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो॥ २०॥
इह सर्वनिरन्तरसर्वचिते इह केवलनिश्चलसर्वचिते। द्विपदादिविवर्जितसर्वचिते किमु रोदिषि मानस सर्वसमम्॥ २१॥
इस संसारमें आत्मा सबमें सदा एकरस चैतन्यरूपसे विद्यमान है; यह एकमात्र निश्चलभावसे सभीके चित्तमें विद्यमान है और दो पैर आदि स्थूल शरीरके भावसे रहित होकर सर्वत्र चैतन्यरूपसे विद्यमान है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो॥ २१॥
अतिसर्वनिरन्तरसर्वगतं अतिनिर्मलनिश्चलसर्वगतम् । दिनरात्रिविवर्जितसर्वगतं किमु रोदिषि मानस सर्वसमम्॥ २२॥
वह चेतन आत्मा अतिशय एकरस होकर सबमें व्याप्त है; वह अत्यन्त निर्मल तथा अचल होकर सबमें व्याप्त है; वह दिन-रातसे रहित होकर सबमें व्याप्त है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो॥ २२॥
५९६ * गीता-संग्रह *
न हि बन्धविबन्धसमागमनं
न हि योगवियोगसमागमनम्।
न हि तर्कवितर्कसमागमनं
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम्॥ २३॥
सामान्य बन्धन तथा विशेष बन्धन दोनोंका आगमन आत्मामें नहीं होता है, उसमें योगका तथा वियोगका आगमन नहीं होता और तर्कका तथा वितर्कका भी समावेश नहीं होता है; हे मन ! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ २३ ॥
इह कालविकालनिराकरण-
मणुमात्रकृशानुनिराकरणम् ।
न हि केवलसत्यनिराकरणं
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम्॥ २४॥
इस आत्मामें सामान्य कालका तथा विशेष कालका निराकरण है; इसमें अणुमात्र भी अग्निका (भौतिक तत्त्वोंका) निराकरण है, इसमें एकमात्र सत्यका निराकरण नहीं है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ २४ ॥
इह देहविदेहविहीन इति
ननु स्वप्नसुषुप्तिविहीनपरम्।
अभिधानविधानविहीनपरं
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम्॥ २५॥
यह आत्मा देह तथा विदेहसे रहित है; यह निश्चय ही स्वप्न तथा सुषुप्तिसे भी रहित और परे है, यह कथन तथा विधानसे भी रहित और परे है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो, तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ २५ ॥
- अवधूतगीता ( १ )* ५१७
गगनोपमशुद्धविशालसम-
मतिसर्वविवर्जितसर्वसमम् ।
गतसारविसारविकारसमं
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ २६ ॥
वह आत्मा आकाशके समान शुद्ध, विशाल तथा सम है; वह समस्त मिथ्या-प्रपंचसे रहित और सम है; वह सार, विसार तथा विकारसे विहीन है और सम है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ २६ ॥
इह धर्मविधर्मविरागतर-
मिह वस्तुविवस्तुविरागतरम् ।
इह कामविकामविरागतरं
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ २७ ॥
इस संसारमें श्रेष्ठ वैराग्य होनेपर सामान्य और विशेष धर्म सभी समान हैं, सामान्य और विशेष पदार्थ सभी समान हैं तथा सामान्य और विशेष इच्छा सभी समान है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ २७ ॥
सुखदुःखविवर्जितसर्वसम-
मिह शोकविशोकविहीनपरम् ।
गुरुशिष्यविवर्जिततत्त्वपरं
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ २८ ॥
वह चेतन आत्मा सुख-दुःखसे रहित है तथा सर्वसम है; वह शोक तथा विशोकसे पूर्णतः रहित है; वह गुरु-शिष्य-सम्बन्धसे रहित परमतत्त्व है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ २८ ॥
५९८ * गीता-संग्रह *
न किलाङ्कुरसारविसार इति
न चलाचलसाम्यविसाम्यमिति।
अविचारविचारविहीनमिति
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम्॥ २९॥
आत्मामें निश्चित रूपसे सार-असारका कोई अंकुर नहीं होता है; उसमें चल, अचल, साम्य तथा वैषम्य भी नहीं होते हैं; वह अविचार तथा विचारसे रहित है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो॥ २९॥
इह सारसमुच्चयसारमिति
कथितं निजभावविभेद इति।
विषये करणत्वमसत्यमिति
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम्॥ ३०॥
इस आत्मामें सम्पूर्ण सारोंका भी सार विद्यमान है। यहाँ अपने भावको यथावत् कह दिया है। सांसारिक विषयोंके प्रति कर्तव्य असत्य ही है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो॥ ३०॥
बहुधा श्रुतयः प्रवदन्ति यतो
वियदादिरिदं मृगतोयसमम्।
यदि चैकनिरन्तरसर्वसमं
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम्॥ ३१॥
अनेक श्रुतियाँ कहती हैं कि जो कुछ भी आकाश आदि यह प्रपंच है, सब मृगतृष्णाके जलके समान है। यदि एकमात्र चेतन आत्मा ही नित्य तथा सर्वसम है तो फिर हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो॥ ३१॥
* अवधूतगीता ( १ ) * ५९९
विन्दति विन्दति नहि नहि यत्र
छन्दो लक्षणं नहि नहि तत्र।
समरसमग्नो भावितपूतः
प्रलपति तत्त्वं परमवधूतः ॥ ३२ ॥
पवित्रतासे युक्त तथा एकरस आत्मानन्दमें मग्न परम अवधूत उस आत्मामें कुछ भी नहीं देखता है और वहाँ कुछ भी नहीं प्राप्त करता है; क्योंकि वहाँ छन्दादि लक्षण वस्तुतः नहीं हैं; वह अवधूत तो एकमात्र परमतत्त्वका ही कथन करता है ॥ ३२ ॥
॥ इति श्रीदत्तात्रेयविरचितायामवधूतगीतायामात्मसंवित्त्युपदेशो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
छठा अध्याय
आत्माके सर्वभेदातीतत्वका विचार तथा आत्मतत्त्वबोध
अवधूत उवाच
बहुधा श्रुतयः प्रवदन्ति वयं
वियदादिरिदं मृगतोयसमम्।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिव-
मुपमेयमथो ह्युपमा च कथम् ॥ १ ॥
अवधूत श्रीदत्तात्रेयजी बोले—अनेक श्रुतियाँ कहती हैं कि हम तथा आकाश आदि यह समस्त प्रपंच मृगतृष्णाके जलके समान है। यदि वह चेतन आत्मा एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो यह उपमेय और उपमाका व्यवहार कैसे हो सकता है ? ॥ १ ॥
अविभक्तिविभक्तिविहीनपरं
ननु कार्यविकार्यविहीनपरम्।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं
यजनं च कथं तपनं च कथम् ॥ २ ॥
वह चेतन आत्मा विभाग तथा अविभागसे विहीन और परे है;
६०० * गीता-संग्रह *
वह कार्य तथा कार्याभावसे रहित और परे है। यदि वह एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो पूजन और तप किसलिये ? ॥ २ ॥
मन एव निरन्तरसर्वगतं ह्यविशालविशालविहीनपरम् । मन एव निरन्तरसर्वशिवं मनसापि कथं वचसा च कथम् ॥ ३ ॥
मन ही (आत्मरूपसे) निरन्तर और सर्वगत है; वह विस्तार तथा विस्तारके अभावसे रहित और परे है। मन ही निरन्तर, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है; उस परब्रह्मको मनके द्वारा कैसे जाना जा सकता है और वाणीके द्वारा उसका कथन कैसे किया जा सकता है ? ॥ ३ ॥
दिनरात्रिविभेदनिराकरण- मुदितानुदितस्य निराकरणम् । यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं रविचन्द्रमसौ ज्वलनश्च कथम् ॥ ४ ॥
उस चेतन आत्मामें दिन तथा रात्रिके भेदका निषेध है; उसमें सूर्य आदिके उदय होने अथवा उदय न होनेका भी निराकरण है। यदि वह आत्मा एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो ये सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्निरूप भिन्न कैसे हो सकते हैं ? ॥ ४ ॥
गतकामविकामविभेद इति गतचेष्टविचेष्टविभेद इति । यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं बहिरन्तरभिन्नमतिश्च कथम् ॥ ५ ॥
उस चेतन आत्मामें कामना तथा कामनाके अभावका भेद नहीं है। उसमें चेष्टा तथा चेष्टाके अभावका भेद भी नहीं है। यदि वह एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो उसमें बाहर और भीतरके
- अवधूतगीता (१) * ६०१
भेदकी बुद्धि कैसे हो सकती है?॥५॥ यदि सारविसारविहीन इति यदि शून्यविशून्यविहीन इति। यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं प्रथमं च कथं चरमं च कथम्॥६॥ यदि वह चेतन आत्मा सार तथा असारसे रहित है; यदि वह शून्य तथा अशून्यसे रहित है और यदि वह एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो फिर उसमें आदि कैसे और अन्त कैसे हो सकता है?॥६॥
यदि भेदविभेदनिराकरणं यदि वेदकवेद्यनिराकरणम्। यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं तृतीयं च कथं तुरीयं च कथम्॥७॥ यदि वह चेतन आत्मा भेद तथा अभेदसे रहित है; यदि वह ज्ञाता तथा ज्ञेयके भेदसे रहित है और यदि वह एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो उसमें तृतीय और चतुर्थ-अवस्था कैसे हो सकती है?॥७॥
गदितागदितं न हि सत्यमिति विदिताविदितं न हि सत्यमिति। यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं विषयेन्द्रियबुद्धिमनांसि कथम्॥८॥ कथित और अकथित व्यवहार सत्य नहीं है; ज्ञात और अज्ञात भी सत्य नहीं है। यदि वह आत्मा एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो फिर विषय, इन्द्रिय, बुद्धि तथा मन उसमें कैसे हो सकते हैं?॥८॥
६०२ * गीता-संग्रह *
गगनं पवनो न हि सत्यमिति धरणी दहनो न हि सत्यमिति। यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं जलदश्च कथं सलिलं च कथम्॥९॥
आकाश तथा वायु सत्य नहीं हैं, पृथ्वी तथा अग्नि भी सत्य नहीं हैं। यदि वह आत्मा एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो फिर मेघ कैसे सत्य हो सकता है और जल कैसे सत्य हो सकता है?॥९॥
यदि कल्पितलोकनिराकरणं यदि कल्पितदेवनिराकरणम्। यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं गुणदोषविचारमतिश्च कथम्॥१०॥
यदि कल्पित लोकोंका उसमें निषेध है; यदि कल्पित देवताओंका उसमें निषेध है और यदि वह आत्मा एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो फिर गुण तथा दोषके विचारकी बुद्धि कैसे हो सकती है?॥१०॥
मरणामरणं हि निराकरणं करणाकरणं हि निराकरणम्। यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं गमनागमनं हि कथं वदति॥११॥
वह चेतन आत्मा मरण तथा अमरणसे रहित है; वह कर्तव्य तथा अकर्तव्यसे भी रहित है। यदि वह एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो उसमें गमन तथा आगमनका भाव कैसे कहा जा सकता है?॥११॥
- अवधूतगीता (१) * ६०३
प्रकृतिः पुरुषो न हि भेद इति न हि कारणकार्यविभेद इति। यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं पुरुषापुरुषं च कथं वदति॥१२॥
‘प्रकृति और पुरुष’ का भेद वास्तवमें है ही नहीं; कारण तथा कार्यका भी भेद नहीं है। यदि वह आत्मा एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो यह पुरुष है तथा यह पुरुष नहीं है—यह कैसे कहा जा सकता है?॥१२॥
तृतीयं न हि दुःखसमागमनं न गुणाद् द्वितीयस्य समागमनम्। यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं स्थविरश्च युवा च शिशुश्च कथम्॥१३॥
दुःख (और सुखके द्वन्द्व)-से तीसरेकी उत्पत्ति नहीं होती, एक गुणसे दूसरे गुणकी उत्पत्ति नहीं होती। यदि वह आत्मा एक, नित्य, सर्वरूप और कल्याणस्वरूप है तो वृद्ध, युवा और बालककी भिन्न स्थिति कैसे हो सकती है?॥१३॥
ननु आश्रमवर्णविहीनपरं ननु कारणकर्तृविहीनपरम्। यदि चैकनिरन्तरसर्वशिव- मविनष्टविनष्टमतिश्च कथम्॥१४॥
वह आत्मा निश्चय ही आश्रम तथा वर्णसे रहित है; वह निश्चय ही कारण तथा कर्तासे भी रहित है। यदि वह आत्मा एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो उसके विषयमें नाश होने तथा नाश न होनेवाली बुद्धि कैसे हो सकती है?॥१४॥
६०४ * गीता-संग्रह *
ग्रसिताग्रसितं च वितथ्यमिति
जनिताजनितं च वितथ्यमिति।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिव-
मविनाशिविनाशि कथं हि भवेत् ॥ १५ ॥
वह चेतन आत्मा ग्रसनेवाला है और ग्रसित किया जाता है—यह मिथ्या है; वह उत्पन्न करनेवाला है और उत्पन्न होनेवाला है—यह भी मिथ्या है। यदि वह आत्मा एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो वह नाशरहित अथवा नाशवान् कैसे हो सकता है?॥ १५॥
पुरुषापुरुषस्य विनष्टमिति
वनितावनितस्य विनष्टमिति।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिव-
मविनोदविनोदमतिश्च कथम् ॥ १६ ॥
वह आत्मा पुरुष है या पुरुष नहीं है—यह विचार व्यर्थ है; वह स्त्री है या स्त्री नहीं है—यह विचार भी व्यर्थ है। यदि वह एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो शोक और हर्षकी बुद्धि कैसे हो सकती है?॥ १६॥
यदि मोहविषादविहीनपरो
यदि संशयशोकविहीनपरः।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिव-
महमेति ममेति कथं च पुनः ॥ १७ ॥
यदि वह चेतन आत्मा मोह तथा विषादसे रहित और श्रेष्ठ है; यदि वह संशय तथा शोकसे रहित है और श्रेष्ठ है; यदि वह एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो ‘मैं हूँ तथा यह मेरा है’—इस प्रकारकी बुद्धि कैसे हो सकती है?॥ १७॥
- अवधूतगीता ( १ ) * ६०५
ननु धर्मविधर्मविनाश इति ननु बन्धविबन्धविनाश इति। यदि चैकनिरन्तरसर्वशिव- मिह दुःखविदुःखमतिश्च कथम्॥ १८॥
यदि चेतन आत्मामें धर्म तथा विधर्मका अभाव है; यदि उसमें बन्धन तथा मोक्षका अभाव है और यदि वह एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो इसके प्रति दुःख-सुखकी बुद्धि किस प्रकार हो सकती है?॥ १८॥
न हि याज्ञिकयज्ञविभाग इति न हुताशनवस्तुविभाग इति। यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं वद कर्मफलानि भवन्ति कथम्॥ १९॥
याज्ञिक तथा यज्ञमें (वास्तविक) भेद नहीं है; इसी प्रकार अग्नि तथा हवनीय वस्तुमें भी भेद नहीं है। यदि आत्मा एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो फिर बताओ कि कर्मोंके फल किस प्रकार हो सकते हैं?॥ १९॥
ननु शोकविशोकविमुक्त इति ननु दर्पविदर्पविमुक्त इति। यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं ननु रागविरागमतिश्च कथम्॥ २०॥
वह आत्मा निश्चय ही शोक तथा अशोकसे रहित है; वह निश्चय ही अहंकार तथा निरहंकारसे रहित है। यदि वह आत्मा एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो राग-विरागकी बुद्धि कैसे हो सकती है?॥ २०॥
६०६ * गीता-संग्रह *
न हि मोहविमोहविकार इति
न हि लोभविलोभविकार इति।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं
ह्यविवेकविवेकमतिश्च कथम्॥ २१॥
उस आत्मामें मोह तथा विमोहका विकार नहीं है; उसमें लोभ तथा अलोभका भी विकार नहीं है। यदि वह एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो निश्चय ही उसमें विचार तथा अविचारकी बुद्धि कैसे हो सकती है?॥ २१॥
त्वमहं न हि हन्त कदाचिदपि
कुलजातिविचारमसत्यमिति ।
अहमेव शिवः परमार्थ इति
अभिवादनमत्र करोमि कथम्॥ २२॥
अहो, 'तुम' और 'मैं' इस प्रकारका भेद कभी नहीं है; कुल तथा जातिका विचार भी सत्य नहीं है। मैं ही कल्याणरूप तथा परमार्थ तत्त्व हूँ तो फिर [अद्वैतरूप] मैं यहाँ वन्दन किस प्रकार करूँ ? ॥ २२ ॥
गुरुशिष्यविचारविशीर्ण इति
उपदेशविचारविशीर्ण इति।
अहमेव शिवः परमार्थ इति
अभिवादनमत्र करोमि कथम्॥ २३॥
वह चेतन आत्मा गुरु तथा शिष्यभावके विचारसे रहित है; वह उपदेश और तर्ककी भावनासे भी रहित है। मैं ही कल्याणस्वरूप तथा परमार्थ तत्त्व हूँ तो फिर [अद्वैतरूप] मैं यहाँ वन्दन किस प्रकार करूँ?॥ २३॥
न हि कल्पितदेहविभाग इति
न हि कल्पितलोकविभाग इति।
* अवधूतगीता (१) * ६०७
अहमेव शिवः परमार्थ इति
अभिवादनमत्र करोमि कथम्॥ २४॥
यह (स्थूल-सूक्ष्मादि) देहका कल्पित भेद मिथ्या है। यह (चतुर्दश) लोकोंका कल्पित भेद भी मिथ्या है। मैं ही कल्याणस्वरूप तथा परमार्थ-तत्त्व हूँ तो फिर (अद्वैतरूप) मैं यहाँ वन्दन किस प्रकार करूँ? ॥ २४ ॥
सरजो विरजो न कदाचिदपि
ननु निर्मलनिश्चलशुद्ध इति।
अहमेव शिवः परमार्थ इति
अभिवादनमत्र करोमि कथम्॥ २५॥
आत्मा रागयुक्त और रागरहित भी कभी नहीं है; वह निश्चय ही निर्मल, निश्चल तथा शुद्ध है। मैं ही कल्याणरूप तथा परमार्थ तत्त्व हूँ तो फिर [अद्वैतरूप] मैं यहाँ वन्दन किस प्रकार करूँ? ॥ २५ ॥
न हि देहविदेहविकल्प इति
अनृतं चरितं न हि सत्यमिति।
अहमेव शिवः परमार्थ इति
अभिवादनमत्र करोमि कथम्॥ २६॥
उस चेतन आत्मामें देहयुक्त और देहरहित होनेका विकल्प नहीं है; उसमें मिथ्या और सत्य चरित्रका भी विकल्प नहीं है। [आत्मस्वरूप] मैं ही कल्याणरूप तथा परमार्थ तत्त्व हूँ तो फिर [अद्वैतरूप] मैं यहाँ वन्दन किस प्रकार करूँ? ॥ २६ ॥
विन्दति विन्दति नहि नहि यत्र
छन्दो लक्षणं नहि नहि तत्र।
समरसमग्नो भावितपूतः
प्रलपति तत्त्वं परमवधूतः॥ २७॥
पवित्रतासे युक्त तथा एकरस आत्मानन्दमें मग्न परम अवधूत उस आत्मामें कुछ भी नहीं देखता है और वहाँ कुछ भी नहीं प्राप्त करता
६०८ * गीता-संग्रह *
है; क्योंकि वहाँ छन्दादि लक्षण वस्तुतः नहीं हैं; वह अवधूत तो एकमात्र परमतत्त्वका ही कथन करता है॥ २७॥ ॥ इति श्रीदत्तात्रेयविरचितायामवधूतगीतायां स्वामिकार्तिकसंवादे स्वात्मवित्त्युपदेशमोक्षनिर्णयो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
सातवाँ अध्याय
ब्रह्मानन्दमग्न आत्मज्ञानी अवधूतके लक्षण एवं स्थिति
अवधूत उवाच
रथ्याकर्पटविरचितकन्थः
पुण्यापुण्यविवर्जितपन्थः ।
शून्यागारे तिष्ठति नग्नः
शुद्धनिरञ्जनसमरसमग्नः ॥ १॥
अवधूत श्रीदत्तात्रेयजी बोले—गलियोंमें गिरे-पड़े कपड़ोंकी बनी हुई गुदड़ी धारण करनेवाला, पुण्य-पापसे रहित मार्गपर चलनेवाला, शुद्ध चित्तवाला तथा ब्रह्मानन्दके रसमें मग्न अवधूत नग्न होकर एकान्त स्थानमें स्थित रहता है॥ १॥
लक्ष्यालक्ष्यविवर्जितलक्ष्यो
युक्तायुक्तविवर्जितदक्षः ।
केवलतत्त्वनिरञ्जनपूतो
वादविवादः कथमवधूतः ॥ २॥
जो प्रत्यक्ष-परोक्षसे रहित लक्ष्यवाला है; जो विधि-निषेधके वर्जनमें दक्ष है; जो अद्वितीय अविद्याशून्य तत्त्वज्ञानसे पवित्र है—उस अवधूतके लिये वाद-विवाद कैसा?॥ २॥
आशापाशविबन्धनमुक्ताः
शौचाचारविवर्जितयुक्ताः ।
- अवधूतगीता ( १ ) * ६०१
एवं सर्वविवर्जितसन्तस्-
स्तत्त्वं शुद्धनिरञ्जनवन्तः ॥ ३ ॥
अवधूत लोग आशारूपी पाशके बन्धनसे मुक्त हैं; वे शौचाचार आदिसे रहित होकर आत्मासे सदा जुड़े रहते हैं। इस प्रकार वे सभी व्यवहारोंसे रहित रहते हुए तत्त्वस्वरूप हैं तथा शुद्धज्ञानसे सम्पन्न रहते हैं ॥ ३ ॥
कथमिह देहविदेहविचारः
कथमिह रागविरागविचारः ।
निर्मलनिश्चलगगनाकारं
स्वयमिह तत्त्वं सहजाकारम् ॥ ४ ॥
इस अवधूतकी दृष्टिमें देह तथा विदेहका विचार कैसा; इसकी दृष्टिमें राग तथा विरागका विचार कैसा ? वह निर्मल, निश्चल तथा आकाशके समान व्यापक रूपवाला है; वह स्वयं स्वभावतः आत्मतत्त्वस्वरूप है ॥ ४ ॥
कथमिह तत्त्वं विन्दति यत्र
रूपमरूपं कथमिह तत्र ।
गगनाकारः परमो यत्र
विषयीकरणं कथमिह तत्र ॥ ५ ॥
जहाँ तत्त्वज्ञान प्राप्त हो गया, वहाँ साकार-निराकार (रूप-अरूप)-की क्या बात हो सकती है ? जिसे परम आकाशभाव व्याप्त है, उसे सांसारिक विषयोंका प्रपंच कैसे स्पर्श कर सकता है ? ॥ ५ ॥
गगनाकारनिरन्तरहंस-
स्तत्त्वविशुद्धनिरञ्जनहंसः ।
एवं कथमिह भिन्नविभिन्नं
बन्धविबन्धविकारविभिन्नम् ॥ ६ ॥
वह [ब्रह्मस्वरूप] अवधूत आकाशतुल्य, शाश्वत तथा हंसरूप
६१० * गीता-संग्रह *
है। वह परमतत्त्व, विशुद्ध, मायामलसे रहित तथा हंसस्वरूप है। इस प्रकार इस [आत्मस्वरूप अवधूत]-में भेद-विभेद एवं बन्ध-विबन्धका विकार तथा भेद किस प्रकार हो सकता है? ॥ ६ ॥
केवलतत्त्वनिरन्तरसर्वं
योगवियोगौ कथमिह गर्वम्।
एवं परमनिरन्तरसर्व-
मेवं कथमिह सारविसारम् ॥ ७ ॥
एकमात्र आत्मतत्त्व ही शाश्वत तथा सर्वरूप है; उसमें संयोग, वियोग तथा अहंकार कैसे हो सकते हैं? इस प्रकार जब वह परम, शाश्वत सर्वरूप है तो फिर उसमें सार-असार कैसा? ॥ ७ ॥
केवलतत्त्वनिरञ्जनसर्वं
गगनाकारनिरन्तरशुद्धम् ।
एवं कथमिह सङ्गविसङ्गं
सत्यं कथमिह रङ्गविरङ्गम् ॥ ८ ॥
केवल आत्मतत्त्व ही अज्ञानरहित, सर्वरूप, आकाशके समान व्यापक, एकरस तथा शुद्ध है; ऐसा होनेपर इस आत्मामें संग तथा असंग कैसे हो सकते हैं और इसमें सत्य, वर्ण तथा विवर्णका भाव कैसे होगा? ॥ ८ ॥
योगवियोगै रहितो योगी
भोगविभोगै रहितो भोगी।
एवं चरति हि मन्दं मन्दं
मनसा कल्पितसहजानन्दम् ॥ ९ ॥
वह आत्मज्ञानी अवधूत योग तथा वियोगसे रहित योगी है एवं भोग तथा विरागसे रहित भोगी भी है। इस प्रकार वह मनके द्वारा कल्पित स्वाभाविक आनन्दको धीरे-धीरे प्राप्त करता रहता है॥ ९ ॥
- अवधूतगीता (१) * ६११
| बोधविबोधैः | सततं | युक्तो |
|---|---|---|
| द्वैताद्वैतैः | कथमिह | मुक्तः । |
| सहजो | विरजः | कथमिह |
| शुद्धनिरञ्जनसमरसभोगी |
ज्ञान तथा अज्ञानसे तथा द्वैत-अद्वैतकी भावनासे निरन्तर युक्त योगी इस संसारमें कैसे मुक्त हो सकता है? स्वभावसे ही राग-रहित योगी शुद्ध, अज्ञानरहित आत्मानन्दका भोग कैसे कर सकता है ? ॥ १० ॥
| भग्नाभग्नविवर्जितभग्नो | |
|---|---|
| लग्नालग्नविवर्जितलग्नः | । |
| एवं कथमिह | सारविसारः |
| समरसतत्त्वं | गगनाकारः ॥ ११ ॥ |
वह आत्मतत्त्व खण्ड तथा अखण्डके भावसे रहित है; वह संसर्ग-विसर्गके भावोंसे भी रहित है। इस प्रकार इस आत्मतत्त्वमें सार तथा विसार कैसे हो सकते हैं? यह समरस, परमतत्त्वस्वरूप तथा आकाशके समान व्यापक आकारवाला है ॥ ११ ॥
| सततं | सर्वविवर्जितयुक्तः |
|---|---|
| सर्वं | तत्त्वविवर्जितमुक्तः । |
| एवं कथमिह | जीवितमरणं |
| ध्यानाध्यानैः कथमिह | करणम् ॥ १२ ॥ |
योगी निरन्तर समस्त प्रपंचोंसे रहित होकर आत्मतत्त्वमें लीन रहता है; वह सम्पूर्ण तत्त्वोंसे रहित होकर जीवन्मुक्त है। ऐसी स्थितिमें उसका जीवन और मरण कैसे हो सकता है; इसी प्रकार उसे ध्यान तथा ध्यानका अभाव किस प्रकार हो सकता है ? ॥ १२ ॥