भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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५९४ * गीता-संग्रह *


परोक्ष भी दोनों असत्य ही हैं। जब सत्य केवल आत्मस्वरूपमें ही निहित है, तब हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ १६ ॥

इह सर्वसमं खलु जीव इति
इह सर्वनिरन्तरजीव इति।
इह केवलनिश्चलजीव इति
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ १७ ॥

इस जगत्में निश्चय ही आत्मा सबमें समरूप है, आत्मा सबमें निरन्तर विद्यमान है। इस जगत्में केवल निश्चल आत्मा ही है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ १७ ॥

अविवेकविवेकमबोध इति
अविकल्पविकल्पमबोध इति।
यदि चैकनिरन्तरबोध इति
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ १८ ॥

अविवेक तथा विवेक अज्ञान ही है और विकल्पका अभाव तथा विकल्प भी अज्ञान ही है। यदि एकमात्र शाश्वत ज्ञान ही है तो हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ १८ ॥

न हि मोक्षपदं न हि बन्धपदं
न हि पुण्यपदं न हि पापपदम्।
न हि पूर्णपदं न हि रिक्तपदं
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ १९ ॥

इस आत्मामें न मोक्षपद है न बन्धपद है, न पुण्यपद है न पापपद है और न पूर्णपद है न रिक्तपद है; तो फिर हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ १९ ॥

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