भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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पृष्ठ 596

* अवधूतगीता (१) * ५९५


यदि वर्णविवर्णविहीनसमं यदि कारणकार्यविहीनसमम्। यदि भेदविभेदविहीनसमं किमु रोदिषि मानस सर्वसमम्॥ २०॥

यदि आत्मा वर्ण अथवा वर्णविशेषके अभावसे रहित है और सम है; यदि वह कारण तथा कार्यसे रहित और सम है; यदि वह भेद तथा विभेदसे रहित है और सम है तो हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो॥ २०॥

इह सर्वनिरन्तरसर्वचिते इह केवलनिश्चलसर्वचिते। द्विपदादिविवर्जितसर्वचिते किमु रोदिषि मानस सर्वसमम्॥ २१॥

इस संसारमें आत्मा सबमें सदा एकरस चैतन्यरूपसे विद्यमान है; यह एकमात्र निश्चलभावसे सभीके चित्तमें विद्यमान है और दो पैर आदि स्थूल शरीरके भावसे रहित होकर सर्वत्र चैतन्यरूपसे विद्यमान है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो॥ २१॥

अतिसर्वनिरन्तरसर्वगतं अतिनिर्मलनिश्चलसर्वगतम् । दिनरात्रिविवर्जितसर्वगतं किमु रोदिषि मानस सर्वसमम्॥ २२॥

वह चेतन आत्मा अतिशय एकरस होकर सबमें व्याप्त है; वह अत्यन्त निर्मल तथा अचल होकर सबमें व्याप्त है; वह दिन-रातसे रहित होकर सबमें व्याप्त है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो॥ २२॥

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