भारतकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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  • अवधूतगीता ( १ ) * ६०१

एवं सर्वविवर्जितसन्तस्-
स्तत्त्वं शुद्धनिरञ्जनवन्तः ॥ ३ ॥

अवधूत लोग आशारूपी पाशके बन्धनसे मुक्त हैं; वे शौचाचार आदिसे रहित होकर आत्मासे सदा जुड़े रहते हैं। इस प्रकार वे सभी व्यवहारोंसे रहित रहते हुए तत्त्वस्वरूप हैं तथा शुद्धज्ञानसे सम्पन्न रहते हैं ॥ ३ ॥

कथमिह देहविदेहविचारः
कथमिह रागविरागविचारः ।
निर्मलनिश्चलगगनाकारं
स्वयमिह तत्त्वं सहजाकारम् ॥ ४ ॥

इस अवधूतकी दृष्टिमें देह तथा विदेहका विचार कैसा; इसकी दृष्टिमें राग तथा विरागका विचार कैसा ? वह निर्मल, निश्चल तथा आकाशके समान व्यापक रूपवाला है; वह स्वयं स्वभावतः आत्मतत्त्वस्वरूप है ॥ ४ ॥

कथमिह तत्त्वं विन्दति यत्र
रूपमरूपं कथमिह तत्र ।
गगनाकारः परमो यत्र
विषयीकरणं कथमिह तत्र ॥ ५ ॥

जहाँ तत्त्वज्ञान प्राप्त हो गया, वहाँ साकार-निराकार (रूप-अरूप)-की क्या बात हो सकती है ? जिसे परम आकाशभाव व्याप्त है, उसे सांसारिक विषयोंका प्रपंच कैसे स्पर्श कर सकता है ? ॥ ५ ॥

गगनाकारनिरन्तरहंस-
स्तत्त्वविशुद्धनिरञ्जनहंसः ।
एवं कथमिह भिन्नविभिन्नं
बन्धविबन्धविकारविभिन्नम् ॥ ६ ॥

वह [ब्रह्मस्वरूप] अवधूत आकाशतुल्य, शाश्वत तथा हंसरूप