गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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है; क्योंकि वहाँ छन्दादि लक्षण वस्तुतः नहीं हैं; वह अवधूत तो एकमात्र परमतत्त्वका ही कथन करता है॥ २७॥ ॥ इति श्रीदत्तात्रेयविरचितायामवधूतगीतायां स्वामिकार्तिकसंवादे स्वात्मवित्त्युपदेशमोक्षनिर्णयो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
सातवाँ अध्याय
ब्रह्मानन्दमग्न आत्मज्ञानी अवधूतके लक्षण एवं स्थिति
अवधूत उवाच
रथ्याकर्पटविरचितकन्थः
पुण्यापुण्यविवर्जितपन्थः ।
शून्यागारे तिष्ठति नग्नः
शुद्धनिरञ्जनसमरसमग्नः ॥ १॥
अवधूत श्रीदत्तात्रेयजी बोले—गलियोंमें गिरे-पड़े कपड़ोंकी बनी हुई गुदड़ी धारण करनेवाला, पुण्य-पापसे रहित मार्गपर चलनेवाला, शुद्ध चित्तवाला तथा ब्रह्मानन्दके रसमें मग्न अवधूत नग्न होकर एकान्त स्थानमें स्थित रहता है॥ १॥
लक्ष्यालक्ष्यविवर्जितलक्ष्यो
युक्तायुक्तविवर्जितदक्षः ।
केवलतत्त्वनिरञ्जनपूतो
वादविवादः कथमवधूतः ॥ २॥
जो प्रत्यक्ष-परोक्षसे रहित लक्ष्यवाला है; जो विधि-निषेधके वर्जनमें दक्ष है; जो अद्वितीय अविद्याशून्य तत्त्वज्ञानसे पवित्र है—उस अवधूतके लिये वाद-विवाद कैसा?॥ २॥
आशापाशविबन्धनमुक्ताः
शौचाचारविवर्जितयुक्ताः ।