गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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- अवधूतगीता (१) * ६११
| बोधविबोधैः | सततं | युक्तो |
|---|---|---|
| द्वैताद्वैतैः | कथमिह | मुक्तः । |
| सहजो | विरजः | कथमिह |
| शुद्धनिरञ्जनसमरसभोगी |
ज्ञान तथा अज्ञानसे तथा द्वैत-अद्वैतकी भावनासे निरन्तर युक्त योगी इस संसारमें कैसे मुक्त हो सकता है? स्वभावसे ही राग-रहित योगी शुद्ध, अज्ञानरहित आत्मानन्दका भोग कैसे कर सकता है ? ॥ १० ॥
| भग्नाभग्नविवर्जितभग्नो | |
|---|---|
| लग्नालग्नविवर्जितलग्नः | । |
| एवं कथमिह | सारविसारः |
| समरसतत्त्वं | गगनाकारः ॥ ११ ॥ |
वह आत्मतत्त्व खण्ड तथा अखण्डके भावसे रहित है; वह संसर्ग-विसर्गके भावोंसे भी रहित है। इस प्रकार इस आत्मतत्त्वमें सार तथा विसार कैसे हो सकते हैं? यह समरस, परमतत्त्वस्वरूप तथा आकाशके समान व्यापक आकारवाला है ॥ ११ ॥
| सततं | सर्वविवर्जितयुक्तः |
|---|---|
| सर्वं | तत्त्वविवर्जितमुक्तः । |
| एवं कथमिह | जीवितमरणं |
| ध्यानाध्यानैः कथमिह | करणम् ॥ १२ ॥ |
योगी निरन्तर समस्त प्रपंचोंसे रहित होकर आत्मतत्त्वमें लीन रहता है; वह सम्पूर्ण तत्त्वोंसे रहित होकर जीवन्मुक्त है। ऐसी स्थितिमें उसका जीवन और मरण कैसे हो सकता है; इसी प्रकार उसे ध्यान तथा ध्यानका अभाव किस प्रकार हो सकता है ? ॥ १२ ॥