गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६१२ * गीता-संग्रह *
इन्द्रजालमिदं सर्वं यथा मरुमरीचिका।
अखण्डितघनाकारो वर्तते केवलः शिवः॥ १३॥
यह सम्पूर्ण जगत्-प्रपंच इन्द्रजाल तथा मरुदेशमें मृगमरीचिकाके जलके समान मिथ्या है। अविनाशी, परिपूर्ण तथा [एकमात्र] कल्याणस्वरूप आत्मतत्त्व ही सत्य है॥ १३॥
धर्मादौ मोक्षपर्यन्तं निरीहाः सर्वथा वयम्।
कथं रागविरागैश्च कल्पयन्ति विपश्चितः॥ १४॥
हम लोग धर्मसे लेकर मोक्षपर्यन्त चारों पुरुषार्थोंके प्रति कामनारहित हैं। विद्वान् लोग राग तथा विरागकी कल्पना किस प्रकार करते रहते हैं?॥ १४॥
विन्दति विन्दति नहि नहि यत्र
छन्दो लक्षणं नहि नहि तत्र।
समरसमग्नो भावितपूतः
प्रलपति तत्त्वं परमवधूतः॥ १५॥
पवित्रतासे युक्त तथा एकरस आत्मानन्दमें मग्न परम अवधूत उस आत्मामें कुछ भी नहीं देखता है और वहाँ कुछ भी नहीं प्राप्त करता है; क्योंकि वहाँ छन्दादि लक्षण वस्तुतः नहीं हैं। वह अवधूत एकमात्र परमतत्त्वका ही कथन करता है॥ १५॥
॥ इति श्रीदत्तात्रेयविरचितायामवधूतगीतायां स्वामिकार्तिकसंवादे स्वात्मसंवित्त्युपदेशे सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥
आठवाँ अध्याय
मुनि (आत्मज्ञानी) एवं अवधूतके लक्षण तथा स्त्रीसंग-परित्यागकी प्रेरणा
अवधूत उवाच
त्वद्यात्रया व्यापकता हता ते
ध्यानेन चेतःपरता हता ते।