गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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न किलाङ्कुरसारविसार इति
न चलाचलसाम्यविसाम्यमिति।
अविचारविचारविहीनमिति
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम्॥ २९॥
आत्मामें निश्चित रूपसे सार-असारका कोई अंकुर नहीं होता है; उसमें चल, अचल, साम्य तथा वैषम्य भी नहीं होते हैं; वह अविचार तथा विचारसे रहित है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो॥ २९॥
इह सारसमुच्चयसारमिति
कथितं निजभावविभेद इति।
विषये करणत्वमसत्यमिति
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम्॥ ३०॥
इस आत्मामें सम्पूर्ण सारोंका भी सार विद्यमान है। यहाँ अपने भावको यथावत् कह दिया है। सांसारिक विषयोंके प्रति कर्तव्य असत्य ही है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो॥ ३०॥
बहुधा श्रुतयः प्रवदन्ति यतो
वियदादिरिदं मृगतोयसमम्।
यदि चैकनिरन्तरसर्वसमं
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम्॥ ३१॥
अनेक श्रुतियाँ कहती हैं कि जो कुछ भी आकाश आदि यह प्रपंच है, सब मृगतृष्णाके जलके समान है। यदि एकमात्र चेतन आत्मा ही नित्य तथा सर्वसम है तो फिर हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो॥ ३१॥