गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अवधूतगीता ( १ )* ५१७
गगनोपमशुद्धविशालसम-
मतिसर्वविवर्जितसर्वसमम् ।
गतसारविसारविकारसमं
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ २६ ॥
वह आत्मा आकाशके समान शुद्ध, विशाल तथा सम है; वह समस्त मिथ्या-प्रपंचसे रहित और सम है; वह सार, विसार तथा विकारसे विहीन है और सम है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ २६ ॥
इह धर्मविधर्मविरागतर-
मिह वस्तुविवस्तुविरागतरम् ।
इह कामविकामविरागतरं
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ २७ ॥
इस संसारमें श्रेष्ठ वैराग्य होनेपर सामान्य और विशेष धर्म सभी समान हैं, सामान्य और विशेष पदार्थ सभी समान हैं तथा सामान्य और विशेष इच्छा सभी समान है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ २७ ॥
सुखदुःखविवर्जितसर्वसम-
मिह शोकविशोकविहीनपरम् ।
गुरुशिष्यविवर्जिततत्त्वपरं
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम् ॥ २८ ॥
वह चेतन आत्मा सुख-दुःखसे रहित है तथा सर्वसम है; वह शोक तथा विशोकसे पूर्णतः रहित है; वह गुरु-शिष्य-सम्बन्धसे रहित परमतत्त्व है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ २८ ॥