गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ६४ तुम स्वयं भी बड़े चतुर हो ॥ २ ॥ ये अपने शत्रुओंका युद्धमें दलन कर मेरे यज्ञकी रक्षा करेंगे और थोड़े ही दिनोंमें कुशलपूर्वक घर लौट आयेंगे । तुलसीदासजी कहते हैं, इन रघुवंशतिलककी कीर्तिका कविजन गान करेंगे ॥ ३ ॥ [ ५१ ] रहे ठगिसे नृपति सुनि मुनिबरके बयन । कहि न सकत कछु राम-प्रेमबस, पुलक गात, भरे नीर नयन ॥ १ ॥ गुरु बसिष्ठ समुझाय कह्यो तब हिय हरषाने, जाने सेष-सयन । सौंपि सुत गहि पानि, पाँय परि, भूसुर उर चले उमगि चयन ॥ २ ॥ तुलसी प्रभु जोहत पोहत चित, सोहत मोहत कोटि मयन । मधु-माधव-मूरति दोउ सँग मानो दिनमनि गवन कियो उतर अयन ॥ ३ ॥ मुनिवर विश्वामित्रके वचन सुनकर महाराज दशरथ ठगे-से रह गये । वे भगवान् रामके प्रेमवश कुछ कह न सके । उनका शरीर रोमाञ्चित हो गया तथा नेत्रोंमें जल भर आया ॥ १ ॥ तब गुरु वसिष्ठजीने उन्हें समझाया । इससे उन्होंने भगवान् रामको शेषशायी भगवान् जाना तथा मनमें हर्ष माना । फिर उन्होंने पुत्रोंका हाथ पकड़कर विश्वामित्रजीके चरणोंमें गिरकर उन्हें सौंप दिया । इससे मुनिवरके हृदयमें आनन्द उमड़ने लगा ॥ २ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं—भगवान् करोड़ों कामदेवोंके समान शोभायमान एवं मनोमोहक हैं, वे दृष्टि पड़ते ही चित्तको अपनेमें बाँध लेते हैं । वे ऐसे जान पड़ते हैं मानो सूर्यदेवके उत्तरायणमें गमन करते समय, साथमें चैत्र और वैशाख दोनों मासोंकी मूर्तियाँ विराजमान हैं ॥ ३ ॥