गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६५ बालकाण्ड राग सारङ्ग [ ५२ ] ऋषि सँग हरषि चले दोउ भाई । पितु-पद बंदि सीस लियो आयसु, सुनि सिष आसिष पाई ॥ १ ॥ नील पीत पाथोज बरन बपु, बय किसोर बनि आई । सर धनु-पानि, पीत पट कटितट, कसे निखंग बनाई ॥ २ ॥ कलित कंठ मनि-माल, कलेवर चंदन खौरि सुहाई । सुंदर बदन, सरोरुह-लोचन, मुखछबि बरनि न जाई ॥ ३ ॥ पल्लव, पंख, सुमन सिर सोहत क्यों कहौं बेष-लुनाई ? मनु मूरति धरि उभय भाग भइ त्रिभुवन सुंदरताई ॥ ४ ॥ पैठत सरनि, सिलनि चढ़ि चितवत खग-मृग-बन-रुचिराई । सादर सभय सप्रेम पुलकि मुनि पुनि-पुनि लेत बुलाई ॥ ५ ॥ एक तीन तकि हती ताड़का, बिद्या बिप्र पढ़ाई । राख्यो जग्य जीति रजनीचर, भइ जग-बिदित बड़ाई ॥ ६ ॥ चरन-कमल-रज-परस अहल्या निज पति-लोक पठाई । तुलसिदास प्रभुके बूझे मुनि सुरसरि कथा सुनाई ॥ ७ ॥ ऋषिवरके साथ दोनों भाई प्रसन्न होकर चले । पिताजीके चरणोंकी वन्दना कर उनकी आज्ञाको शिरोधार्य किया तथा उनकी शिक्षा सुन आशीर्वाद लिया ॥ १ ॥ दोनों भाइयोंके शरीर नीले और पीले कमलोंके रङ्गके हैं तथा किशोर अवस्था है। उनके हाथोंमें धनुष-बाण तथा कमरमें पीताम्बर एवं तरकस शोभायमान हैं ॥ २ ॥ मनोहर कण्ठमें मणियोंकी माला है, शरीरमें चन्दनकी खौर शोभायमान है तथा उनके मनोहर शरीर, कमल-जैसे नयन एवं मुखकी छबिका वर्णन नहीं किया जाता ॥ ३ ॥ सिरपर नवीन पत्ते, पङ्ख और पुष्प