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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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गीतावली ६६ शोभायमान हैं । उनके वेषकी सुन्दरता किस प्रकार वर्णन करूँ ? मानो त्रिभुवनकी सुन्दरता ही मूर्तिमती होकर दो भागोंमें बँट गयी है ॥ ४ ॥ दोनों भाई सरोवरोंमें घुसते तथा शिलाओंपर चढ़कर पक्षी, मृग और वनकी सुन्दरता निहारते हैं। तब मुनिवर भययुक्त और प्रेमपुलकित हो उन्हें आदरपूर्वक बारम्बार बुला लेते हैं ॥ ५ ॥ विश्वामित्रजीने उन्हें बाणविधि सिखायी । प्रभुने ताड़काको निशाना बनाकर एक ही तीरसे मार डाला । फिर भगवान्ने राक्षसोंको जीतकर यज्ञकी रक्षा की, इससे संसारमें उनकी प्रशंसा फैल गयी ॥ ६ ॥ तदनन्तर रघुनाथजीने अपने चरणकमलसे स्पर्श करके ही अहल्याको अपने पतिलोकमें पहुँचा दिया । तुलसीदासजी कहते हैं, इसी समय प्रभुके पूछनेपर मुनिने गङ्गाजीकी कथा सुनायी ॥ ७ ॥ राग नट [ ५३ ] दोउ राजसुवन राजत मुनिके संग । नखसिख लोने, लोने बदन, लोने लोने लोयन, दामिनि-बारिद-बरबरन अंग ॥ १ ॥ सिरनि सिखा सुहाइ, उपबीत पीत पट, धनु-सर कर, कसे कटिनिखंग । मानो मख-रज निसिचर हरिबेको सुत पावकके साथ पठये पतंग ॥ २ ॥ करत छाँह घन, बरषै सुमन सुर, छबि बरनत अतुलित अनंग । तुलसी प्रभु बिलोकि मग-लोग, खग-मृग प्रेममगन रँगे रूप-रंग ॥ ३ ॥ मुनिके सङ्ग दोनों राजकुमार शोभायमान हैं। वे नखसे सिखतक सुन्दर हैं, उनके मुख और नयन भी अत्यन्त मनोहर हैं तथा शरीर बिजली और मेघके समान अति सुन्दर गौर एवं श्यामवर्ण हैं ॥ १ ॥

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