गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ११० हैं ? इनके शरीर तरुण, तमाल और मनोहर चम्पक-पुष्पके समान श्याम और गौर-वर्ण हैं। अहा ! ये किस बड़भागीके पुण्यकर्म फलित हुए हैं ॥ १ ॥ जनकजीने सुखके निधान प्रभुको पाकर उन्हें हृदयमें ले जाकर पट लगा दिये और ठगके-से लड्डू खाकर प्रेमकी मदिरासे छक गये । जनकजी स्वार्थहीन तथा परमार्थपरायण कहलाते थे; किन्तु इस समय वे स्नेहवश होकर विदेहताको भूल गये ॥ २ ॥ प्रभु शीलरूप अमृतके आगार और शोभाके समुद्र हैं । जनकजी उसमें तैर तैरकर हार गये, फिर भी उन्हें उसका पार नहीं मिला। सम्पूर्ण सभाके नेत्र उतावले होकर प्रभुमें लग गये, मन अत्यन्त अनुरक्त हो गये तथा चित्त एकरसरूप हो गये ॥ ३ ॥ अपने-अपने भावके अनुसार जैसा जिसका भाव था, वह उसी प्रकार मन-ही-मन राम और लक्ष्मणसे सम्बन्ध जोड़ने लगा । जो प्रभु प्रीति, प्रतीति, स्मरण, सेवन और शरण ग्रहण करने योग्य हैं उनका आश्रय तुलसीदासजीने भी ताका है ॥ ४ ॥ [ ६५ ] ए कौन कहाँतें आए ? नील-पीत-पाथोज-बरन, मन-हरन, सुभाय सुहाए ॥ १ ॥ मुनिसुत किधौं भूप-बालक, किधौं ब्रह्म-जीव जग जाए । रूप-जलधिके रतन, सुछबि-तिय-लोचन ललित ललाए ॥ २ ॥ किधौं रबि-सुवन, मदन-ऋतुपति, किधौं हरि-हर बेष बनाए । किधौं आपने सुकृत-सुरतरुके सुफल रावरेहि पाए ॥ ३ ॥ भए बिदेह बिदेह नेहबस देहदसा बिसराए । पुलक गात, न समान हरष हिय, सलिल सुलोचन छाए ॥ ४ ॥ जनक-बचन मृदु मंजु मधु-भरे भगति कौसिकहि भाए । तुलसी अति आनंद उमगि उर राम लखन गुन गाए ॥ ५ ॥