गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०६ बालकाण्ड इन्होंने ताड़काको मारा है तथा शत्रुको जीतकर यज्ञकी रक्षा की है। इस बातको भी संसार जानता है कि इन्होंने मार्गमें मुनिपत्नीका उद्धार किया है॥ ४॥ प्रिय पाहुने जानकर नगरके सभी नर- नारियोंने प्रभुको अपने नेत्रोंमें स्थान दिया। तुलसीदासजी कहते हैं—प्रभुको देखकर सभी लोग जनकके समान [ विदेह ] हो गये [अर्थात् अपनी देहकी दशा भूल गये] ॥ ५ ॥ राग तोड़ी [ ६४ ] बूझत जनक 'नाथ' ढोटा दोउ काके हैं ? तरुन तमाल चारु चंपक-बरन तनु कौन बड़े भागीके सुकृत परिपाके हैं ॥ १ ॥ सुखके निधान पाये, हियके पिधान लाये, ठगके-से लाडू खायें, प्रेम-मधु छाके हैं। स्वारथ-रहित परमारथी कहावत हैं, भे सनेह-बिबस बिदेहता बिबाके हैं ॥ २ ॥ सील-सुधाके अगार, सुखमाके पारावार, पावत न पैरि पार पैरि पैरि थाके हैं। लोचन ललकि लागे, मन अति अनुरागे, एक रसरूप चित सकल सभाके हैं ॥ ३ ॥ जिय जिय जोरत सगाई राम लखनसों आपने आपने भाय जैसे भाय जाके हैं। प्रीतिको, प्रतीको, सुमिरिबेको, सेइबेको, सरनको समरथ तुलसिहु ताके हैं ॥ ४ ॥ जनकजी पूछने लगे—हे नाथ ! ये दोनों बालक किसके