गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ११२ काकसिखा सिर, कर केलि-तून-धनु-सर, बालक-बिनोद जातुधाननिसों रनु भो। बूझत बिदेह अनुराग-आचरज-बस, ऋषिराज जाग भयो, महाराज अनु भो ॥ ३ ॥ भूमिदेव, नरदेव, सचिव परस्पर कहत, हमहिं सुरतरु सिवधनु भो। सुनत राजाकी रीति, उपजी प्रतीति-प्रीति, भाग तुलसीके, भले साहेबको जनु भो ॥ ४ ॥ [जनकजीके ये वचन सुनकर] परम कृपालु विश्वामित्रजीका शरीर भी पुलकित हो गया। उनके हृदयमें अनुराग उमँगने लगा। उन्होंने सभाके भाग्यकी सराहना की। जनकजीकी दशा देखकर उनका चित्त कहनेके लिये प्रवृत्त हुआ ॥ १ ॥ [ वे कहने लगे— 'राक्षस लोग मेरे यज्ञमें विघ्न डालते थे, मैंने सोचा ] ये पापी हैं, इनसे प्रीति करना तो उचित नहीं और शाप देनेमें भी बड़ा पाप लगता है, अतः यज्ञरक्षाके मिषसे ही मेरा अयोध्यापुरीमें जाना हुआ। मैंने दशरथजीसे उनके प्राणोंसे भी प्यारे पुत्र माँगे; सत्यसन्ध दशरथ- जीने मुझे तत्काल इन्हें दे दिया। यद्यपि [ इनमें अधिक स्नेह होनेके कारण ] उन्होंने बड़ा शोक सहा और उनका घर सूना-सा हो गया ॥ २ ॥ उस समय इनके मस्तकपर काकपक्ष, हाथमें खेलके तरकस और धनुष-बाण थे। तब बालकेलिके रूपमें ही इनका राक्षसोंसे युद्ध हुआ।' यह सुनकर जनकजी प्रेम और आश्चर्यवश पूछने लगे, 'महाराज ! तो क्या फिर आपका यज्ञ पूर्ण हो गया ?' (विश्वामित्रजीने कहा—) 'आप स्वयं अनुभव कर लीजिये' ॥ ३ ॥