गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११३ बालकाण्ड तब ब्राह्मणलोग, महाराज जनक और मन्त्रिगण आपसमें कहने लगे- 'हमको तो शिवजीका धनुष कल्पवृक्ष हो गया।' राजा जनककी रीति सुन तुलसीदासके मनमें भी प्रतीति और प्रीति उत्पन्न हुई। उसके बड़े भाग्य हैं कि वह ऐसे स्वामीका [ जिनके दर्शन पाकर ब्रह्मज्ञानी जनकजी भी प्रेमविभोर हो गये थे ] सेवक हुआ ॥ ४ ॥ [ ६७ ] चार्यो भले बेटा देव दसरथ रायके। जैसे राम-लषन, भरत-रिपुहन तैसे, सील-सोभा-सागर, प्रभाकर प्रभायके ॥ १ ॥ ताड़का सँहारि मख राखे, नीके पाले व्रत, कोटि कोटि भट किये एक एक घायके। एक बान बेगही उड़ाने जातुधान-जात, सूखि गये गात हैं, पतौंगा भये बायके ॥ २ ॥ सिलाछोर छुवत अहल्या भई दिव्यदेह, गुन पेखे पारसके पंकरुह पायके। रामके प्रसाद गुर गौतम खसम भये, रावरेहु सतानंद पूत भये मायके ॥ ३ ॥ प्रेम-परिहास-पोख बचन परस्पर कहत सुनत सुख सब ही सुभायके। तुलसी सराहें भाग कौसिक जनकजूके, बिधिके सुढर होत सुढर सुदायके ॥ ४ ॥ महाराज दशरथके चारों ही पुत्र बड़े सुन्दर हैं। जैसे राम- लक्ष्मण हैं वैसे ही भरत और शत्रुघ्नजी भी शील और शोभाके समुद्र तथा प्रभावके सूर्य हैं ॥ १ ॥ इन्होंने ताड़काका संहार कर मेरे यज्ञकी गी० ८-