गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ११४ भलीभांति रक्षा और अपनी प्रतिज्ञाका पालन किया। इन्होंने करोड़ों शूरवीरोंको अपने एक-एक ही वारसे धराशायी कर दिया। इनके एक ही बाणके वेगसे अनेक राक्षससमूह उड़ गये। उनके शरीर सूखकर मानो हवामें उड़नेवाले पत्ते ही हो गये ॥ २ ॥ शिलाके छोरका स्पर्श करते ही अहल्या दिव्य देहमयी हो गयी। इस प्रकार इनके चरणकमलोंमें पारसकागुण देखा गया है। इस प्रकार रामचन्द्रजी की कृपासे [अहल्याका उद्धार हुआ और आपके पुरोहित शतानन्दजीके पिता] गुरु गौतमजी सपत्नीक हुए तथा शतानन्दजी अपनी माताके पुत्र हुए [अर्थात् इन्हें फिरसे अहल्या मिल गयीं] ॥ ३ ॥ इस प्रकार आपसमें प्रेम और परिहाससे पोषित वचन कहते-सुनते सबको स्वाभाविक ही सुख मिला। तुलसीदास कहते हैं कि विश्वामित्रजी महाराज जनकके सौभाग्यकी सराहना करते हैं और कहते हैं, विधाताके दायें होनेपर अच्छे दांवके पासे भी पड़ने लगते हैं ॥ ४ ॥ [ ६७ ] ये दोऊ दसरथके बारे। नाम राम घनस्याम, लखन लघु, नखसिख अँग उजियारे ॥ १ ॥ निज हित लागि मांगि आने मैं धरमसेतु-रखवारे। धीर बीर बिरुदैत, बाँकुरे महाबाहु बल भारे ॥ २ ॥ एक तीर तकि हती ताड़का, किये सुर-साधु सुखारे। जग्य राखि, जग साखि, तोषि ऋषि, निदरि निसाचर मारे ॥ ३ ॥ मुनितिय तारि स्वयंबर पेखन आये सुनि बचन तिहारे। एउ देखिहैं पिनाकु नेकु, जेहि नृपति लाज-ज्वर जारे ॥ ४ ॥ सुनि सानंद सराहि सपरिजन, बारहि बार निहारे। पूजि सप्रेम, प्रसंसि कौसिकहि भूपति सदन सिधारे ॥ ५ ॥