गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें· ११५ बालकाण्ड सोचत सत्य-सनेह-बिबस निसि, नृपहि गनत गये तारे। पठये बोलि भोर, गुरके सँग रंगभूमि पगु धारे ॥ ६ ॥ नगर-लोग सुधि पाइ मुदित, सब ही सब काज बिसारे। मनहु मघा-जल उमगि उदधि-रुख चले नदी-नद-नारे ॥ ७ ॥ ए किसोर, धनु घोर बहुत, बिलखात बिलोकनिहारे। टरघो न चाप तिन्ह तें, जिन्ह सुभटनि कौतुक कुधर उखारे ॥ ८ ॥ ए जाने बिनु जनक जानियत करि पन भूप हँकारे। नतरु सुधासागर परिहरि कंत कूप खनावत खारे ॥ ९ ॥ सुखमा सील-सनेह सानि मनो रूप बिरंचि सँवारे। रोम-रोमपर सोम-काम सत कोटि बारि फेरि डारे ॥ १० ॥ कोउ कहै, तेज-प्रताप-पुंज चितये नहिं जात, भैया रे। छुअत सरासन-सलभ जरैगो ए दिनकर-बंस-दिया रे ॥ ११ ॥ एक कहै, कछु होउ, सुफल भये जीवन-जनम हमारे। अवलोके भरि नयन आजु तुलसीके प्रानपियारे ॥ १२ ॥ ये दोनों दशरथजीके पुत्र हैं। इनमें जो मेघके समान श्यामवर्ण हैं उनका नाम राम है और जिनके नखसे शिखतक सारे अङ्ग उज्ज्वलवर्ण हैं वे छोटे भाई लक्ष्मणजी है ॥ १ ॥ इन धर्ममर्यादा- की रक्षा करनेवालोंको मैं अपने हितके लिये माँग लाया था। ये बड़े ही धीर, वीर, यशस्वी, रणबाँकुरे, महाबाहु और बलशाली हैं ॥ २ ॥ इन्होंने एक तीर छोड़कर ही ताड़काको मार डाला और सब देवता तथा साधुजनोंको सुखी कर दिया। इस प्रकार यज्ञकी रक्षा कर मुनियोंको सन्तुष्ट किया तथा राक्षसोंका तिरस्कारपूर्वक वध किया— इस विषयमें सारा जगत् साक्षी है ॥ ३ ॥ तत्पश्चात् ऋषि-पत्नीका उद्धार कर आपकी प्रतिज्ञा सुन यहाँ स्वयंवर देखनेके लिये पधारे