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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 122, कुल 454 में से

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पृष्ठ 122

गीतावली ११६ हैं। आपके जिस धनुषने राजाओंको लज्जारूप ज्वरसे सन्तप्त कर दिया है, उसे तनिक ये भी देखेंगे ॥ ४ ॥ मुनीश्वरके ये वचन सुन जनकजीने अपने कुटुम्बियोंके सहित उनकी आनन्दपूर्वक सराहना की और बारम्बार प्रभुकी ओर देखकर तथा उनकी पूजा कर, विश्वामित्रजीकी प्रशंसा करते अपने घरको चले गये ॥ ५ ॥ सत्य स्नेहवश (अपनी प्रतिज्ञाकी कठिनता देखकर) वे विचारमें पड़ गये। इस प्रकार सारी रात महाराजको तारे गिनते बीत गयी। प्रातःकाल होनेपर राजाने उन्हें बुलावा भेजा। तब प्रभुने गुरुजीके साथ रङ्ग- भूमिमें पदार्पण किया ॥ ६ ॥ भगवान्‌के पधारनेका समाचार पाकर नगरके लोग प्रसन्न हो गये और सभीने सारे काम भुला दिये, मानो मघा नक्षत्रकी जलवृष्टिसे समस्त नदी, नद और नाले उमड़कर समुद्रकी ओर चले हों ॥ ७ ॥ सभी दर्शकगण यह सोचकर कि ये तो किशोर अवस्थाके हैं और धनुष बड़ा सुदृढ़ है, दुःखी हो गये। [ उन्होंने सोचा ] यह धनुष तो उन योद्धाओंसे भी विचलित नहीं हुआ, जिन्होंने खेलहीमें बड़े-बड़े पर्वतोंको उखाड़ डाला था [ फिर इन सुकुमार बालकोंसे यह कैसे उठ सकेगा ? ] ॥ ८ ॥ मालूम होता है, महाराज जनकने इन्हें न जाननेके कारण ही इस प्रकारका प्रण करके अन्य राजाओंको बुला लिया था, नहीं तो भला अमृत-समुद्रको छोड़कर खारी कुआं कौन खुदवावेगा ? ॥ ९ ॥ ब्रह्माजीने सुन्दरता, शील और स्नेहको सानकर ही मानो इनके रूप रचे हैं। इनके रोम-रोमपर अरबों चन्द्रमा और कामदेव वारकर फेंक दिये हैं ॥१०॥ कोई कहते हैं—'भैया रे ! ये तेज और प्रतापके पुञ्ज हैं, इसीसे इनकी ओर देखा नहीं जाता। ये सूर्यवंशके दीपक हैं, इनके स्पर्श

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