गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११७ बालकाण्ड करते ही धनुषरूप पतङ्ग भस्म हो जायगा ॥११॥ अन्य लोग बोले, 'भाई ! कुछ भी हो, हमारे तो जीवन और जन्म आज सुफल हो गये, क्योंकि आज हमने नयन भरकर तुलसीदासके प्राणप्यारेका दर्शन किया है' ॥१२॥ [ ६९ ] जनक बिलोकि बार बार रघुबरको । मुनिपद सीस नाय, आयसु-असीस पाय, एई बातें कहत गवन कियो घरको ॥ १ ॥ नींद न परति राति, प्रेम-पन एक भाँति, सोचत, सकोचत बिरंचि-हरि-हरको । तुम्हते सुगम सब देव ! देखिबेको अब जस हंस किए जोगवत जुग परको ॥ २ ॥ ल्याए संग कौसिक, सुनाए कहि गुनगन, आए देखि दिनकर कुल-दिनकरको । तुलसी तेऊ सनेहको सुभाउ बाउ मानो चलदलको सो पात करै चित चरको ॥ ३ ॥ जनकजी बार-बार रघुनाथजीको देखकर, मुनिवरके चरणोंमें सर नवा, उनकी आज्ञा और आशीर्वाद पा, ये ही बातें करते अपने घरको गये ॥ १ ॥ रघुनाथजीका प्रेम ओर धनुष तोड़नेको प्रतिज्ञा—ये दोनों ही समान हैं, अतः इनके लिये उन्हें बड़ा सोच हो रहा है और रात्रिमें निद्रा भी नहीं पड़ती । [अपनी कार्यसिद्धिके लिये प्रार्थना कर] वे ब्रह्मा, विष्णु और महादेवको भी संकोचमें डालते हैं और यह कहते हुए कि 'हे देव ! तुम्हारी कृपासे सब कुछ देखना सुगम है' वे अपने सुयशको हंसरूप किये उसके [ प्रेम