गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ११८ और प्राणरूप ] दोनों परोंकी सँभाल करते हैं ॥ २ ॥ इसी समय श्रीविश्वामित्रजी दोनों भाइयोंको साथ ले आये और उनके गुणगण कह सुनाये । तुलसीदास कहते हैं—सूर्यकुलके सूर्य श्रीरामचन्द्रको आया देख महाराज जनकका चित्त स्नेहकी स्वाभाविक वायुके झकोरेसे पीपलके पत्तेके समान चञ्चल हो गया ॥ ३ ॥ राग केदारा [ ७० ] रंग-भूमि भोरे ही जाइकै । राम-लषन लखि लोग लूटिहैं लोचन-लाभ आघइकै ॥ १ ॥ भूप-भवन, घर घर, पुर बाहर, इहै चरचा रही छाइकै । मगन मनोरथ-मोद नारि-नर, प्रेम-बिबस उठैं गाइकै ॥ २ ॥ सोचत बिधि-गति समुझि, परस्पर कहत बचन बिलखाइकै । कुंवर किसोर, कठोर सरासन, असमंजस भयो आइकै ॥ ३ ॥ सुकृत सँभारि, मनाइ पितर-सुर, सीस ईसपद नाइकै । रघुबर-कर धनु-भंग चहत सब अपनो-सो हितु चितु लाइकै ॥ ४ ॥ लेत भरत कनसुई सगुन सुभ, बूझत गनक बोलाइ कै । सुनि अनुकूल, मुदित मन मानहु धरत धीरजहि धाइ कै ॥ ५ ॥ कौसिक-कथा एक एकनिसों कहत प्रभाउ जनाइ कै । सीय-राम-संजोग जानियत, रच्यो बिरंचि बनाइकै ॥ ६ ॥ एक सराहि सुबाहु-मथन बर बाहु, उछाह बढ़ाइकै । सानुज राज-समाज बिराजिहैं राम पिनाक चढ़ाइकै ॥ ७ ॥ बड़ी सभा बड़ो लाभ, बड़ो जस, बड़ी बड़ाई पाइकै । को सोहिहै, औरको लायक रघुनायकहि बिहाइकै ? ॥ ८ ॥ भवनिहैं गँवाहि गवाँइ गरब गृह नृपकुल बलहि लजाइकै । भलीभाँति साहब तुलसीके चलिहैं ब्याहि बजाइकै ॥ ९ ॥