भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 127

१२१ बालकाण्ड बीत और कमरमें पीताम्बर तथा बायें हाथमें फूलोंके दोने शोभायमान हैं, जिनसे उनकी सुन्दरता सवायी हो गयी है ॥ १ ॥ दोनों भाई [स्वभावसे ही] रूपके भण्डार हैं, तिसपर भी राजकुमार, सुकुमार शरीर, गुरुके प्राणाधार और उनके साथ सेवाभावसे उपस्थित हैं। वे नीचके समान गुरुजीकी टहलमें लगे रहते हैं; उनका रुख देखकर परिचर्या करते हैं, इससे उन्होंने विश्वामित्र-जैसे क्रोधी मुनीश्वरको भी अपने अधीन कर लिया ॥ २ ॥ दैववश इसी समय पार्वतीजीका पूजन करनेके लिये सखियोंके सहित श्रीसीताजी आ गयीं। वहाँ उन्होंने राम और लक्ष्मणको देखा और उन्हें साक्षात् ऋतुराज वसन्त और कामदेव ही समझा। उन्हें देखकर वे ऐसी मोहित हो गयीं मानो कामदेवने उनके मस्तकपर मोहिनी डाल दी हो ॥ ३ ॥ भगवान् राम और सीताजीके दृष्टिमिलापका जो आनन्द हुआ वह कहने योग्य नहीं है, मैंने तो कुछ बातें-सी बना दी हैं। उस समय भगवान् राम, सीता, सखीजन, लक्ष्मणजी और तुलसीदास—इनमेंसे जिनका जैसी सम्बन्ध है उनका वैसा ही चित्त हो गया ॥ ४ ॥ [ ७२ ] पूजि पारबती भले भाय पांय परिकै । सजल सुलोचन, सिथिल तनु पुलकित, आवै न बचन, मन रह्यो प्रेम भरिकै ॥ १ ॥ अंतरजामिनि भवभामिनि स्वामिनिसों हौं, कही चाहौं बात, मातु, अंत तौ हौं लरिकै । मूरति कृपालु मंजु माल दै बोलत भई, पूजो मन कामना भावतो बरु बरिकै ॥ २ ॥