भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 128

गीतावली १२२ राम कामतरु पाइ, बेलि ज्यौं बौंड़ी बनाइ, मांग-कोषि तोषि पोषि, फैलि-फूलि-फरिकै । रहौगी, कहौगी तब, सांची कही अंबा सिय, गहे पांय द्वै, उठाय, माथे हाथ धरिकै ॥ ३ ॥ मुदित असीस सुनि, सीस नाइ पुनि पुनि, बिदा भईं देवीसों जननि डर डरिकै । हरषीं सहेली, भयो भावतो, गावतीं गीत, गवनी भवन तुलसीस-हिया हरिकै ॥ ४ ॥ श्रीसीताजीने बड़े भावसे चरणोंमें पड़कर पार्वतीजीका पूजन किया। उनके नेत्र सजल हो गये, शरीर शिथिल और पुलकित हो गया, मुखसे वचन नहीं निकलता तथा मन प्रेमसे भर गया ॥ १ ॥ [वे कहने लगीं-] 'मैं शङ्करप्रिया अन्तर्यामिनी और सम्पूर्ण जगत्‌की स्वामिनी आपसे अपने हृदयकी बात कहना चाहती हूँ [आप क्षमा करें]; क्योंकि हे मातः ! आखिर मैं लड़की ही तो हूँ।' तब कृपामयी भवानीकी मूर्ति अपनी मनोहर माला देकर बोली, 'सीते ! अपना मनचाहा वर वरण करके अपनी सब कामनाएँ पूर्ण करो ॥ २ ॥ तुम रामरूप कल्पवृक्षको पाकर, उसे बेलके समान अपना आश्रय बना, सुहाग और कोखसे सन्तुष्ट हो, फैल-फूलकर फलोगी । हे सीते ! उस समय तुम कहोगी कि 'अम्बाजीने ठीक ही कहा था।' तब सीताजीने उनके दोनों चरण पकड़ लिये और उन्होंने माथेपर हाथ रखकर उन्हें उठा लिया ॥ ३ ॥ देवीका आशीर्वाद सुन सीताजी परम आनन्दित हो उन्हें पुनः-पुनः मस्तक नवा, [विलम्ब हो जानेके कारण] माताका भय मानकर उनसे विदा हुईं और अपना