गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली १३०
॥ 'अरी सखि ! सुन, महाराज जनकने बड़ा ही अच्छा कियां है। देखौं, उनकी कृपासे ही महाराज दशरथके इन दोनों कुमारोंको देखकर नगरनिवासी जीवन धारण कर रहे हैं ॥ १ ॥ मेरे कहनेसे विश्वास कर, चित्तको सन्देहवश क्यों करती है ! यह महादेवजीका धनुष तभीतक दीखता है जबतक रघुनाथजी इसे नहीं लेते ॥ २ ॥ जिसे विधाताने सीताजीको सँवारकर रचा है और रामको ऐसा रूप दिया है—तुलसीदास कहते हैं—उस चतुर विधाताने ही अपने हाथसे यह संयोग मिलाया है' ॥ ३ ॥
[ ८० ] अनुकूल नृपहि सूलपानि हैं। नीलकंठ कारुन्यसिंधु हर दीनबन्धु दिनदानि हैं ॥ १ ॥ जो पहिले ही पिनाक जनक कहँ गए सौंपि जिय जानि हैं। बहुरि त्रिलोचन लोचनके फल सबहि सुलभ किये आनि हैं ॥ २ ॥ सुनियत भव-भावते राम हैं, सिय भावति-भवानि हैं। परखत प्रीति प्रतीति, पयज-पनु रहे काज ठटु ठानि हैं ॥ ३ ॥ भये बिलोकि बिदेह नेहबस बालक, बिनु पहिचानि हैं। होत हरे होने बिरबनि दल सुमति कहति अनुमानि हैं ॥ ४ ॥ देखियत भूप भोरके-से उडुगन, गरत गरीब गलानि हैं। तेज प्रताप बढ़त कुँवरनको, जदपि संकोची बानि हैं ॥ ५ ॥ बय किसोर, बरजोर, बाहुबल-मेरु मेलि गुन तानि हैं। श्रवसि राम राजीव-बिलोचन संभु-सरासन भानि हैं ॥ ६ ॥ देखिहैं ब्याह-उछाह नारि-नर, सकल-सुमंगल-खानि हैं। भूरिभाग तुलसी तेऊ, जे सुनिहैं, गाइहैं, बखानि हैं ॥ ७ ॥