भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 135

१२६ बालकाण्ड कै ए, सदा बसहु इन्ह नयनन्हि, कै ए नयन जाहु जित ए, री ॥ २ ॥ कोउ समुझाइ कहै किन भूपहि, बड़े भाग आप इत ए, री । कुलिस-कठोर कहाँ संकर-धनु, मृदुमूरति किसोर कित ए, री ॥ ३ ॥ बिरचत इन्हहिं बिरंचि भुवन सब सुंदरता खोजत रित ए, री । तुलसिदास ते धन्य जनम जन, मन-क्रम-बच जिन्हके हित ए, री ॥ ४ ॥ 'अरी सखि ! जबसे राम-लक्ष्मणको देखा है तबसे जनकपुरके नर-नारी एकटक रह गये हैं; उन्हें पलक मारनेमें मानो कई कल्प बीत जाते हैं ॥ १ ॥ वे सब प्रेमके वशीभूत हो महादेवजीसे यही मांगते हैं कि नित्य इन्हें ही देखते रहें, या तो सर्वदा ये ही इन नेत्रोंमें बसे रहें या जिधर वे जायें उधर ही ये नेत्र भी चले जायें ॥ २ ॥ भला कोई व्यक्ति राजाको समझाकर ऐसा क्यों नहीं कहता कि ये बड़े भाग्यसे इधर आये हैं [अतः प्रण त्याग कर इन्हें ही सीताजी विवाह दें] । भला कहाँ तो वज्रसे भी कठोर श्रीमहादेवजीका धनुष और कहाँ ये अति मृदुल किशोर-मूर्ति ? ॥ ३ ॥ इन्हें रचते समय विधाताने सुन्दरताकी खोज करते-करते सारे भुवन खाली कर दिये थे । तुलसीदास कहते हैं, जिन्हें मन, वचन और कर्मसे ये प्रिय हैं उन लोगोंके जन्म धन्य हैं ॥ ४ ॥ [ ७९ ] सुनु सखि, भूपति भलोई कियो, री । जेहि प्रसाद अवधेस-कुँवर दोउ नगर लोग अवलोकि जियो, री ॥ १ ॥ मानि प्रतीति कहे मेरे तैं कत संदेह-बस करति हियो, री । तौलौं है यह संभु सरासन, श्रीरघुबर जौलौं न लियो, री ॥ २ ॥ जेहि बिरंचि रचि सीय सँवारी, औ रामहि ऐसो रूप दियो, री । तुलसिदास तेहि चतुर बिधाता निजकर यह संजोग सियो, री ॥ ३ ॥ गी० ६—