भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 134

गीतावली १२८ वृष्टि करता है और चित्तमें प्रीति तथा आनन्द भरकर उसे आकर्षित कर लेता है।' तुलसीदास कहते हैं—सभी लोग महाराज जनककी प्रशंसा करते हैं कि इस समय महाराजको अच्छा दाँव हाथ लगा, उनके पासे बहुत अच्छे पड़े ॥ ३ ॥ [ ७७ ] नेकु, सुमुखि, चित लाइ चितौ, री। राजकँवर-मूरति रचिबेकी रुचिसुबिरंचिश्रम कियो है कितौ, री ॥ १ ॥ नख-सिख-सुंदरता अवलोकत कह्यो न परत सुख होत जितौ, री। साँवर रूप-सुधा भरिबे कहँ नयन-कमल कल कलस रितौ, री ॥ २ ॥ मेरे जान इन्हें बोलिबे कारन चतुर जनक ठयो ठाट इतौ, री। तुलसी प्रभु भंजिहैं संभु-धनु, भूरिभाग सिय-मातु-पितौ, री ॥ ३ ॥ 'अरी सुमुखि ! तनिक चित्त लगाकर देख तो, इन राजकुमारों- की मनोहर मूर्ति रचनेकी रुचि करके विधाताने कितना परिश्रम किया है ? ॥ १ ॥ अरी ! नखसे सिखतक इनकी सुन्दरता देखकर जितना सुख होता है वह कहा नहीं जाता। इस श्याम-छबिरूप अमृतको भरनेके लिये तुम अपने नेत्रकमलरूप कलशोंको खाली करो ॥ २ ॥ मेरे विचारसे तो इन्हें बुलानेके लिये ही जनकजीने इतना ठाट-बाट रचा है।' तुलसीदास कहते हैं, 'सीताजीके माता- पिताका बड़ा भाग्य है, भगवान् निश्चय ही धनुष तोड़ेंगे' ॥ ३ ॥ राग सारंग [ ७८ ] जबतें राम-लषन चितए, री। रहे इकटक नर-नारि जनकपुर, लागत पलक कलप बितए, री ॥ १ ॥ प्रेम-बिबस माँगत महेस सों, देखत ही रहिए नित ए, री।