गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२७ बालकाण्ड 'हे माई ! देखो, दोनों भाई सीताजीका स्वयंवर देखने आये हैं'—यह सुनते ही सब स्त्रियाँ शरीरमें पुलकित हो मानो मनोहर कामदेवको निहारनेके लिये प्रसन्न चित्तसे जा रही हैं ॥ १ ॥ उनकी सुन्दरता देखकर वे चित्तमें सुख पाकर एक दूसरीसे कहती हैं— 'अरी आली ! आज इस समय तो हम बड़ी भाग्यशालिनी और धन्य हैं।' तुलसीदास कहते हैं, इस प्रकार वे सब सहज प्रेमरूप सुन्दर रङ्गसे अपने चित्तरूप चित्रशालामें उस समाजका चित्र खींचनेमें लग गयीं ॥ २ ॥ राग गौरी [ ७६ ] राम-लषन जब दृष्टि परे, री। अवलोकत सबलोगजनकपुर मानो बिधि बिबिध बिदेह करे, री ॥ १ ॥ धनुषजग्य कमनीय अवनि-तल कौतुकही भए आय खरे, री। छबि-सुर सभा मनहु मनसिजके कलित कलपतरु रूप फरे, री ॥ २ ॥ सकल काम बरषत मुख निरखत, करषत चित हित हरष भरे, री। तुलसी सबै सराहत भूपहि भलैं पैंत पासे सुढर ढरे, री ॥ ३ ॥ 'अरी सखि ! जबसे राम लक्ष्मण दृष्टिगोचर हुए हैं तबसे उन्हें देखनेवाले जनकपुरके लोगोंकी दशा ऐसी हो गयी है, मानो विधाता- ने अनेक विदेह बनाये हैं ॥ १ ॥ इसी समय धनुषयज्ञकी सुरम्य भूमिमें कौतुकसे ही दोनों भाई आ खड़े हुए, मानो छबिरूप देव- सभामें कामदेवके दो मनोहर कल्पवृक्ष सौन्दर्यरूपी फलसे फलित हुए हों ॥ २ ॥ अरी ! इनका मुख देखते ही सारी कामनाओंकी