गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली १२६ अँगरखा पहने आगे-पीछे चलते बड़े शोभायमाम जान पड़ते हैं। ये अच्छोंसे भी अच्छे हैं और अच्छे भावोंसे भाते हैं (सुशोभित हैं) ॥ १ ॥ इनके शरीर श्याम एवं गौर वर्ण हैं, ये महाबाहु और महान् वीर हैं तथा इनके कटिप्रदेशमें बाणयुक्त तरकस और हाथोंमें धनुष शोभायमान है। ये देखनेमें बड़े ही कोमल, सुन्दर और अतुलित बलशाली हैं। इन्हें विश्वामित्रजीने अति सुन्दर ढंगसे धनुर्विद्या सिखायी है ॥ २ ॥ इन्होंने ताड़काको मारा है और अहल्याका उद्धार किया है तथा इन्होंने बड़े-बड़े शूरवीरोंको युद्धमें विचलित कर दिया है। इस समय विश्वामित्रजीकी यज्ञरक्षा करनेवाले ये दशरथराज कुमार जनकजीके बुलानेसे रङ्गभूमिमें पधारे हैं ॥ ३ ॥ शतानन्द और विश्वामित्रजीने पुलकित शरीर हो इनके पवित्र गुणोंको गिनकर महाराज जनकको सुनाया है।' तुलसीदासने भी प्रभुके चरणकमलोंमें चित्त लगा, उस समाजको हृदयमें धारण कर आनन्दसे उमँग-उमँग कर उनका गान किया है ॥ ४ ॥ राग कान्हरा [ ७५ ] सीय स्वयंबरु, माई, दोउ भाई आए देखन। सुनत चलीं प्रमदा प्रमुदित मन, प्रेम पुलकि तनु मनहुँ मदन मंजुल पेखन ॥ १ ॥ निरखि मनोहर तांई सुख पाई कहैं एक-एक सों 'भूरिभाग हम धन्य, आलि ! ए दिन, एखन ।' तुलसी सहज सनेह सुरंग सब सो समाज चित चित्रसार लागी लेखन ॥ २ ॥