भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 139

१३३ बालकाण्ड सरद-सुधा-सदन-छबिहि निंदै बदन, अरुन आयत नवनलिन-लोचन चारु ॥ २ ॥ जनक-मनकी रीति जानि बिरहित प्रीति, ऐसी औ मूरति देखे रह्यो पहिलो बिचारु । तुलसी नृपहि ऐसो कहि न बुझावै कोउ, 'पन औ कुँवरदोऊ प्रेमकी तुला धौं तारु' ॥ ३ ॥ 'अरी सखी ! शोभाका भी परम शृंगाररूप यह अति सुन्दर साँवला वर तो सीताहीके लायक है । यह तो सुन्दरी सीताको ही मिलना चाहिये । यह मनका भी मन मोह लेते हैं । इनकी उपमाके योग्य और कौन हो सकता है ? इनके साथ इनका अनुज यह सुषमासागर राजकुमार सुशोभित है ॥ १ ॥ इनके सब अङ्ग अति सुन्दर हैं, यह देहधारी कामदेव, नेत्रोंका फल अथवा सीताके सुकृतोंका सार ही तो नहीं है ? इनका मुखचन्द्र शरत्कालीन सुधाकरकी छबिकी निन्दा करता है तथा इनके अरुण और विशाल नयन नवीन कमलदलके समान सुन्दर हैं ॥ २ ॥ यदि ऐसी मनो- मोहिनी मूर्तिको देखकर भी जनकजीका पहला (धनुर्भङ्गके प्रणका) विचार बना हुआ है तो उनके चित्तकी रीति प्रीतिसे रहित है ।' तुलसीदासजी कहते हैं, इस समय राजा जनकको कोई ऐसा कहकर नहीं समझाता कि अपने प्रण और इन दोनों राजकुमारोंको प्रेमकी तराजूमें रखकर तौलो तो ॥ ३ ॥ [ ८३ ] देखि देखि री ! दोउ राजसुवन । गोर स्याम सलोने लोने, लोयननि, जिन्हकी सोभा तें सोहै सकल भुवन ॥ १ ॥