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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 140, कुल 454 में से

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पृष्ठ 140

गीतावली १३४ इन्हहीं ताड़का मारी, मग मुनि-तिय तारी, ऋषिमख राख्यो, रन दले हैं दुवन। तुलसी प्रभुको अब जनकनगर-नभ, सुजस-बिमल-बिधु चहत उवन ॥ २ ॥ 'अरी सखी ! इन दोनों राजकुमारोंको तो देख । देख, इनके अति सुन्दर लावण्यमय श्याम-गौर शरीर हैं तथा लुभावने नयन हैं, जिनकी शोभासे सारे भुवन शोभायमान हो रहे हैं ॥ १ ॥ इन्हींने ताड़काको मारा है और मार्गमें मुनि-पत्नीका उद्धार किया है तथा इन्हींने विश्वामित्रजीके यज्ञकी रक्षा कर युद्धमें सुबाहु आदि दुष्टोंका दलन किया है।' तुलसीदास कहते हैं, अब शीघ्र ही जनकपुरीमें प्रभुका सुयशरूप निर्मल चन्द्र उदित होना चाहता है ॥ २ ॥ राग तोड़ी [ ८४ ] राजा रंगभूमि आज बैठे जाइ जाइकैं। अपने अपने थल, अपने अपने साज, अपनी अपनी बर बानिक बनाइकैं ॥ १ ॥ कौसिक सहित राम-लषन ललित नाम, लरिका ललाम लोने पठए बुलाइकैं। दरसलालसा-बस लोग चले भाय भले, बिकसित-मुख निकसत धाइ धाइकैं ॥ २ ॥ सानुज सानंद हिये आगे ह्वै जनक लिये, रचना रुचिर सब सादर देखाइकैं। दिये दिब्य आसन सुपास सावकास अति, आछे आछे बीछे-बीछे बिछौनी बिछाइकें ॥ ३ ॥

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